मुझे याद है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद मार्वल कॉमिक्स ने स्पाइडर मैन का एक स्पेशल इश्यू निकाला था, जो उस दौरान खबरों का भी हिस्सा बना. पूरी कॉमिक्स में न तो कोई कहानी थी और न संवाद.
मंदी ओर युद्ध के विभिन्न दौर से जूझती अमेरिका की युवा पीढ़ी को महानायकों के संबल की हमेशा से जरूरत रही है. यह भूमंडलीकरण की देन है जो इस घटना ने हमें भी मजबूर किया कि हम उसके आइने में अपना आत्मविश्लेषण करें.
यह जरूरी था...
वक्त बीतता गया... शायद यह इतिहास के एक अंक की समाप्ति है...
परदा गिर चुका है...
कहानी अभी बाकी है...
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| चार अलग-अलग कहानियां, अलग जिंदगी.. एक हादसे की परछाईं उस पर छा जाती है... नसीरुद्दीन शाह की निर्देशित पहली फिल्म इस विषय को छूने वाली उस वक्त की अपने में पहली फिल्म. |
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| अफगानिस्तान पर कई डाक्यूमेंट्रीज बना चुके कबीर खान के निर्देशन में बनी काबुल एक्सप्रेस उस अफगानिस्तान को दिखाती है, जो तालिबान आने के बाद उभरता है... |
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| रेंसिल डि-सिल्वा की इस फिल्म की पृष्ठभूमि भी वही थी, यूएस और ग्लोबल आतंकवाद, नजरिया बस कॉमर्शियल था... |
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| शाहरुख खान की बतौर अभिनेता एक महत्वाकांक्षी फिल्म.. एक ग्लोबल विषय को काफी चतुराई से उठाने की कोशिश की गई थी ग्लोबल ऑइियंस और बाजार का ध्यान रखते हुए. |
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| कबीर खान की एक और बेहतरीन फिल्म थी न्यूयार्क यह न्यूयार्क की एक यूनीवर्सिटी में पढ़ने वाले तीन स्टूडेंट्स की कहानी कहती है... 9/11 के बाद... |
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| शायद सबसे दिलचस्प प्रयोग... यह पॉलिटिकल सटायर था, जिसे लोगों ने खूब सराहा, छोटे बजट के इस स्पूफ का निर्देशन किया था अभिषेक शर्मा ने |







1 comments:
और 'तेरे बिन लादेन ' को मैं फुल मार्क्स देता हूँ. लग भग 'जाने भी दो यारो' की टक्कर का सेटायर .........
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