
एक नजर इंडिया के आम आदमी की आइकोनिक इमेज वाली पांच फिल्मों पर
आक्रोश (1980)
आम आदमी का गुस्सा एक कभी न खत्म होने वाली चुप्पी बन सकता है. गोविंद निहलानी की पहली फिल्म आक्रोश में ओम पुरी ने इसका एहसास कराया. विजय तेंडुलकर की लेखनी, निहलानी का डायरेक्शन और नसीर, स्मिता और ओम पुरी की शानदार एक्टिंग इसका दर्जा वर्ल्ड की ग्रेट मूवीज तक पहुंचा देती हैं. पूरी फिल्म में उनकी आंखें बोलती रहीं और उनकी खामोशी ने न सिर्फ एडवोकेट भास्कर कुलकर्णी बने नसीरुद्दीन शाह को बल्कि दर्शकों को भी बेचैन कर दिया. एक रेप केस को खोलने की जद्दोजहद में यह फिल्म पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करना शुरु कर देती है. फिल्म रिलीज हुई तो इसने देश भर में एक बहस छेड़ दी.
जाने भी दो यारों (1983)
कई साल पहले आई इस फिल्म का जादू आज भी बरकरार है. नसीरुद्दीन शाह और रवि वासवानी दरअसल फिल्म में उसी तरह से ठगे जाते हैं, जैसे रीयल में लाइफ कॉमन मैन इस पूरे सिस्टम के हाथों छला जाता है. इसके बावजूद उनकी उम्मीद खत्म नहीं होती, हम होंगे कामयाब... गीत गुनगुनाते हुए वे अपनी हार पर भी हंसते हैं. इस फिल्म में जबरदस्त सटायर होने के वावजूद इसके डायरेक्टर कुंदन शाह ने कहीं बिटरनेस नहीं आने दी और फिल्म का मिजाज हल्का-फुल्का रखा. फिल्म की स्क्रिप्ट ये साली जिंदगी के डायरेक्टर सुधीर मिश्र ने लिखी थी, दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में रवि वासवानी के कैरेक्टर का नाम भी सुधीर मिश्र था.
मैं आजाद हूं (1989)
इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से, हारेगा तू हर बाज़ी जब खेलें हम जी-जान से. पूरी फिल्म में कैफी आज़मी का लिखा यही एक गीत बजता रहता है. अभिताभ को छोड़कर इस फिल्म में अधिकतर एक्टर थिएटर या नॉन कॉमर्शियल सिनेमा से थे. चाहे रघुवीर यादव हों या मनोहर सिंह या रामगोपाल बजाज. हॉलीवुड की फिल्म मीट जॉन डो से इंस्पायर्ड इस फिल्म में आम आदमी मीडिया छल में फंसकर सुसाइड करने पर मजबूर कर दिया जाता है. मगर उसकी इच्छाशक्ति मौत के बाद तमाम लोगों की आवाज बन जाती है. टीनू आनंद ने अपने फिल्म कॅरियर में एक बिल्कुल अलग फिल्म बनाई.
ए वेडनेसडे (2008)

मैं वो हूं जो आज बस और ट्रेन में चढ़ने से डरता है, मैं वो हूं जो काम पर जाता है तो उसकी बीवी को लगता है वह ज़ंग पर जा रहा है. मैं वो हूं जो कभी बरसात में फंसता है कभी ब्लास्ट में. झगड़ा किसी का भी हो, बेवजह मरता मैं ही हूं. भीड़ तो देखी होगी आपने? भीड़ में से कोई भी शक्ल ले लीजिए, वह मैं हूं. ए स्टूपिड! ए स्टूपिड कॉमन मैन... यह नसीरुद्दीन शाह का आखिरी लंबा डायलाग था और शायद आज के दौर में आम आदमी की सबसे बेहतरीन परिभाषा. डायरेक्टर नीरज पांडेय की पहली फिल्म जबरदस्त हिट हुई और लोगों के दिल को भी छुआ.
पीपली लाइव (2010)
नत्था अवश्य मरेगा... टीवी चैनल पर लोग जोर-शोर से कहते हैं. मगर नत्था मरना नहीं चाहता. उसे समझ में नहीं आता कि उसे चारो तरफ कौन सा मीडिया और पॉलीटिक्स का ड्रामा चल रहा है. पीपली लाइव की पॉपुलैरिटी के पीछे शायद यही वजह थी. फिल्म बताती है कि आम आदमी के बहाने सभी अपना हित साधना चाहते हैं. फिल्म की डायरेक्टर अनुष्का रिज़वी ने रीयल लाइफ का टच देकर एक ड्रामा क्रिएट किया और अद्भुत फिल्म बनाई. फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही सिंबालिक है, जब मीडिया में छाया नत्था देखते-देखते महानगर की गुमनाम भीड़ का हिस्सा बन जाता है.
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और अंत में
बातें करने को इतना तरस गया था कि सोचा थोड़ी सी पीकर अपने आप से कुछ कहूंगा....
ज़िंदगी भी इक नशा है दोस्त... जब चढ़ता है तो पूछो मत क्या आलम होता है... लेकिन जब उतरता है...
फिल्म गाइड (1965) में राजू (देव आनंद)
6 comments:
सिनेमा हॉल के अंधेरे कमरे में पर्दे पर जब 'मैं वो हूं जो आज बस और ट्रेन में चढ़ने से डरता है..' सुना था, तो सच कहूं रोएं खड़े हो गए थे। यह प्रतिक्रिया किसी पेशेवर फिल्म क्रिटिक नहीं है, एक आम आदमी की है। आम आदमी, जो अपनी कहानी सिल्वर स्क्रीन पर देखना चाहता है। यह अलग बात है कि वह पैसे खर्च कर मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल में दाखिल होता है लेकिन उसे कभी अपनी कहानी देखने में खराब नहीं लगता है। इस पोस्ट में आपने जो आइकोनिक इमेज दर्शाए हैं, वह यही बयां करता है। शुक्रिया.
याद दिलाने के लिए शुक्रिया. लेकिन मुझे और भी चीज़ें याद आ रही हैं ... मसलन ....एक अर्द्ध सत्य था, और एक अल्बर्ट पिंटो भी जिसे गुस्सा बहुत था.
अजेय जी,
स्वाभाविक तौर पर कई नाम छूट सकते हैं. मगर अर्धसत्य दरअसल कॉमनमैन से जुड़े सवाल न उठाकर एक तंत्र को सवालों के घेरे में लेती है. वहां केंद्र में आम आदमी नहीं व्यवस्था है, वहीं अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है में आम आदमी तो है मगर उसे कॉमन न रखकर थोड़ा स्पेसिफिक तरीके से बात कही गई है, जैसा कि सईद मिर्जा ने अपनी हर फिल्म में किया, इसलिए इस फिल्म को नहीं लिया था.
अर्द्ध सत्य वाली बात समझ सकता हूँ, लेकिन अल्बर्ट पिंटो वाली बात समझने की कोशिश कर रहा हूँ. :)
आपकी बात सही है. मेरा ख्याल था कि अलबर्ट पिंटों आम आदमी के दर्द को बयान करने की कोशिश तो करती है मगर कहीं ज्यादा गहरे अर्थों में एक राजनीतिक फिल्म है. मैं इसे सलीम लंगड़े पर मत रो या विजया मेहता की पेस्तनजी जैसी फिल्मों के करीब रखने की कोशिश करूंगा, जो कम्यूनिटी के बहाने जीवन, समाज और राजनीति के कई पहलुओं को छूने की कोशिश करती हैं.
हाँ, अब पकड़ मे आई है बात. दर असल पेस्तोंजी तो मैं देख ही नही पाया. पिंटो को उस दृष्टि से नही देख पाया. बल्कि तब किशोरावस्था मे वह राजनीतिक दृष्टि भी बन नही पाई थी. एक विचार आया है, इन सब फिल्मो को एक बार फिर से देखा जाए. पकी हुई नज़र के साथ.
आप समानंतर सिनेमा पर लिखते रहिए. इस बहाने उस दौर की बारीकियों से परिचित होना चाहता हूँ. उस दौर मे मेरी खास रुचि है.... मेरे खराब होने का दौर.....
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