October 21, 2010

पूरब और पश्चिम


हाल में क्रुक देखते हुए यह ख्याल आया कि हमारी फिल्मों में विदेशी चरित्रों को पेश करने का तरीका कितना सतही है. क्रुक आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की समस्या की तह तक जाने का दावा करती है, मगर वहां के चरित्रों को ही विश्वसनीय तरीके से नहीं पेश कर पाती. फिल्म की एक अहम किरदार, आस्ट्रेलियन युवती निकोल का चरित्र भी उससे अलग नहीं. यह कैरेक्टर इतना फ्लैट है कि सत्तर के दशक की वैंप का चरित्र-चित्रण उनसे ज्यादा डेप्थ वाला लगता है. निकोल रात को अकेली गाड़ी चलती है, स्ट्रिपीज क्लब में डांस करती है, किसी के साथ हमबिस्तर होने में उसे कोई हिचक नहीं है. उसका फिल्म के नायक से कोई लगाव नहीं है मगर वक्त पड़ने पर वह ईर्ष्या का खेल भी रचती है.

कमोवेश हर गोरी लड़की के बारे में हमारे फिल्मकारों का यह सामान्य नजरिया है. इन दिनों निर्देशकों की दिलचस्पी उनमें सिर्फ इतनी होती है कि वे सेंसर के दायरे में किसी तरह उन्हें टॉपलेस शूट कर लें (याद करें, क्रुक में निकोल बनी शेला- जिसे बेवजह खिड़की तरफ चेहरा करके टी-शर्ट बदलनी पड़ती है, किसना में कैथरीन बनी एंतोनियो बर्नार्थ- जिसे राजकपूर की फिल्मों की तरह पारदर्शी गीले कपड़े पहनकर नदी से निकलना पड़ता है और काइट्स की नताशा यानी बारबरा मोरी- जिसका अंतर्राष्ट्रीय संस्करण शायद ज्यादा हॉट होगा).

हैरत की बात यह है कि बड़े निर्देशकों ने भी कभी इन कैरेक्टर्स की सोशल-कल्चरल डाइमेंशंस को जानने का प्रयास नहीं किया. क्या मेरा नाम जोकर की मारीना के चरित्र में इतनी गहराई थी, जितनी पद्ममिनी या सिमी ग्रेवाल के चरित्र में दिखती है? मनोज कुमार ने पूरब और पश्चिम जैसी फिल्मों के जरिए भारतीय सभ्यता को बेहतर बताने के लिए अपनी फिल्मों में पश्चिमी सभ्यता का मजाक बनाना और उनकी आलोचना शुरु कर दी. उनकी फिल्मों में विदेशी लोग अहंकारी, स्वार्थी, सिर्फ भौतिकता के पीछे भागने वाले दिखाए जाते थे. इन फिल्मों ने विदेशी चरित्रों को प्रस्तुत करने का एक टाइप बना लिया. हैरत होती है कि बीबी कारंत और गिरीश करनाड की गोधुलि में भी एक विदेशी लड़की का चरित्र कोई नया आयाम लेकर नहीं आता. मनोज कुमार की छवियां नमस्ते लंदन तक में थोड़े उत्कृष्ट रूप में देखी जा सकती हैं, जहां पश्चिम के बरक्स भारतीयों की ग्लोबल छवि को प्रस्तुत किया गया था.


हिन्दी फिल्मों में विदेशियों को प्रस्तुत करने का थोड़ा और हास्यास्पद टाइप तलाशें तो कुछ सेट फार्मुले सामने आएंगे. जापानी लोग हमेशा किसी बड़ी साजिश में हिस्सेदारी के लिए पर्दे पर नजर आते हैं. वे अक्सर सूट पहने होते हैं और उन्हें सिर्फ अपने पैसे के बदले मिलने वाली सर्विस से मतलब होता है. भारत-चीन युद्ध के बाद सत्तर के दशक में भारतीय पल्प फिक्शन में चीनी सबसे बड़े खलनायक बनकर उभरे थे. चीनी आम तौर पर सेना के कमांडर या चीनी सिक्रेट सर्विस के दिखाए जाते हैं. भारत में पले-बढ़े प्रबुद्ध विदेशियों बॉब क्रिस्टो और टॉम आल्टर ने भी इसी तरह के न जाने कितने फ्लैट किरदार निभाए. जबकि उनके अभिनय और संवेदनशीलता का बेहतर इस्तेमाल हो सकता था.

उम्मीद के विपरीत कई बार कुछ बेहतर काम भी सामने आ जाते हैं. कृष्णा शाह की फिल्म शॉलीमार में तीन अहम विदेशी किरदार थे. जॉन सेक्सन- जिन्हें ब्रुस ली के साथ एंटर द ड्रैगन में भी देखा जा सकता है, रेक्स हैरिसन और सिल्विया माइल्स. रेक्स हैरिसन फिल्म के मुख्य खलनायक थे और उनकी अदाकारी स्तब्ध कर देने वाली थी. हां, सिल्विया माइल्स फिर से उसी टाइप्ट पश्चिमी औरत के किरदार में थीं, जो अपनी सेक्सुअलिटी का इस्तेमाल सफलता के लिए करती है और किसी के प्रति उसकी वफादारी नहीं होती. पिछले कुछ अर्से में आई फिल्मों में रंग दे बसंती की एलिस पैटन ने शायद एकमात्र वास्तविकता के करीब का किरदार निभाया था. सू के रोल में एलिस ने मौजूदा भारतीय हकीकत का एक पश्चिमी मानसिकता के साथ टकराव खूबसूरती से दर्शाया था.


कहने को तो लगान की रिचेल का नाम भी लिया जा सकता है, पर मेरा मानना है कि रिचेल का रोल भी एक खास टाइप है. इसमें भी डेप्थ की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी. यह दरअसल वो रोल है जिसे पाले खां में फराह खान, किसना में एंतोनियों बर्नार्थ और लगान में रिचेल ने निभाया. एक ब्रिटिश युवती जो संवेदनशील है और जिसे भारतीयों के साथ सहानुभूति है. हमारे फिल्मकारों ने इसमें ज्यादा डाइमेंशन खोजने की जहमत नहीं उठाई. लिहाजा चाहे पाले खां की फराह हो या लगान की रिचेल सभी एक-सी लगती हैं.

वैसे कभी यह समझना दिलचस्प हो सकता है कि विदेशी फिल्मों में भारतीय किरदारों के कितने और कैसे ‘टाइप’ मिलते हैं?

4 comments:

Maan Sengar said...

ise padh kar ek soch samne aai.

PD said...

इसे पढकर हिंदी सिनेमा का एक नया आयाम जैसे सामने खुला.. इससे पहले सिनेमा देखते समय इन बातों पर कभी ध्यान नहीं गया..

बहुत बढ़िया पोस्ट..

नीरज बसलियाल said...

दिनेश, हॉलीवुड भी हम लोगों का कोई बहुत अच्छा पिक्चराइज़ नहीं करता | किसी मूवी में लोगों का हुजूम ताजमहल के आगे हाथ जोड़ के खड़े थे| भारतीय दिखने के लिए लड़के के माथे पे टीका होता है| लड़की हमेशा साडी पहने हुए होती है, और रुद्राक्ष की मालाएं|

आप इस ओर भी कुछ बताएं , अच्छा लगेगा|

कुश said...

रंग दे बसंती की 'सु' का किरदार मुझे ज्यादा डेवल्पड नज़र आता है..

हालाँकि होलीवूड की भी कई फिल्मो में भारतीय लोग सपेरे या बंजारे की तरह ही नज़र आते है.. जैसे कोंसटेनटाईन में भारतीय का तंत्र विद्या जानना या फिर ड्रेग मी टू द हेल में भारतीय का तांत्रिक होना.. हालाँकि फिल्म '2012' में भारतीय व्यक्ति ही पृथ्वी के विनाश के बारे में भविष्यवाणी करता है..

पर आपका लेख बिलकुल उस तरफ ले जाता है.. जहाँ तक कभी हमने सोचा नहीं..

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