October 02, 2010

गांधी को समझना हो तो पॉपुलर कल्चर की तरफ जाएं



आज के संदर्भ में अगर गांधी को समझना हो तो पॉपुलर कल्चर की तरफ जाएं. चाहे वो सिनेमा हो, म्यूजिक हो या महज फैशन. बात सुनने में अटपटी लग सकती है- मगर जीवन के लिए उतनी ही सहज है. अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि हाल के दिनों में गांधी की सबसे बेहतरीन व्याख्या किन्ही भारी-भरकम आलोचनात्मक किताबों में नहीं बल्कि फिल्मों के जरिए हुई है. कम से कम तीन फिल्मों का नाम तो तत्काल लिया जा सकता है- लगे रहो मुन्नाभाई, गांधी माई फादर और मैंने गांधी को नहीं मारा.

दरअसल सिनेमा वैल्यूज को समझने और उन्हें अपनी लाइफ में सहज तरीके से एडाप्ट करने का एक तरीका है. पॉपुलर कल्चर हमेशा अपनी वैल्यूज को री-इंटरप्रिट करता है. इस समझना न सिर्फ जरूरी है बल्कि बेहद दिलचस्प भी. अगर आपको याद हो तो ग्लोबलाइजेशन के तुरंत बाद के दौर में हम आपके हैं कौन जैसी फिल्मों ने ओपेन इकोनामी के असर और इंडियन वैल्यूज के बीच बैलेंस बनाने का मैसेज बड़ी खूबसूरती से दिया था. ये फिल्में बताती थीं कि हम हिन्दुस्तानी आधुनिकता में किसी से पीछे नहीं हैं मगर अपनी कल्चरल वैल्यूज को हम नहीं भूले हैं. यानी कि उन वैल्यूज से ही हमारा कैरेक्टर बनता है.

अगर याद करें तो दिल चाहता है जैसी फिल्म सोशल प्रेशर के बीच जिंदगी को नितांत इंडिविजुअल तरीके से देखे जाने की बात करती थी. इसके नायक लाइफ को अपने तरीके से जीना चाहते थे. अगर याद करें तो यह फिल्म एक ऐसे वक्त में आई थी जब अचानक भारत की शांत और ठहरी सी लगने वाली सोशल लाइफ में प्रतिस्पर्धा की होड़ शामिल हो गई थी. एक ऐसा तनाव जिसने हमारे अरबन यूथ को नर्वस ब्रेकडाउन की स्थिति में पहुंचा दिया था. यह एक कल्ट मूवी साबित हुई और आज भी यंगस्टर्स के बीच उतनी ही पॉपुलर है जितनी रिलीज के वक्त थी.

यूथ के बीच एक और फिल्म ने कल्ट मूवी का दर्जा हासिल किया और यह थी रंग दे बसंती. कुछ युवाओं का ग्रुप, जो अपनी जिंदगी बेमकसद जीता है और जो फिलहाल अपने कल्चरल रूट्स से कटा हुआ है- अचानक अपनी जिंदगी और सिर्फ जिंदगी ही नहीं अपनी मौत तक के लिए एक मकसद चुनने में कामयाब हो जाता है. दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में इसका जरिया बनती है एक विदेशी युवती, जो हिन्दुस्तान के भुला दिए गए क्रांतिकारियों पर डाक्यू-फिक्शन बनाने आई है. यह फिल्म कई मायनों में उल्लेखनीय थी. इसने क्रांति की किताबों में दबाकर रखी जाने वाले विचार से अलग व्याख्या की. भले ही वह व्याख्या फिल्मी हो मगर उसका सीधा सा तर्क यह है कि किसी भी विचार का हमारे जीवन और समाज में क्या महत्व है.

कुछ ऐसे ही सवाल खड़े करती थी फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई. अपने ह्यूमर से लोगों को बांधे रखने वाली यह फिल्म कई दिलचस्प सिंबल क्रिएट करती है. दरअसल मुन्नाभाई का भ्रम उसकी स्प्लिट पर्सनैलिटी का हिस्सा है, या दूसरे शब्दों में कहें तो एक सिंबल के तौर पर वह हर एक आम हिन्दुस्तानी की स्प्लिट पर्सनैलिटी है. वैल्यूज उसके भीतर हैं मगर एक बहुत ही मुश्किल दौर में उन वैल्यूज के साथ खड़े होने का तरीका हमारे पास नहीं है. हमने अपनी सबसे बेहतरीन मूल्यों को शोकेस में सजा दिया है. मैंने गांधी को नहीं मारा भी दरअसल आम हिन्दुस्तानी के भीतर के गिल्ट को एक व्यक्ति के साइको-एनॉलिसिस के जरिए समझने की कोशिश है.

गांधी माई फादर आधुनिक संदर्भ लिए बगैर इतिहास में जाकर सीधे कई सवालों से मुठभेड़ करती है. इसके लिए वह एक गांधी विरोधी कैरेक्टर गढ़ती है, और फिर उसकी कसौटी पर गांधी को कसती है. क्योंकि गांधी के बेटे के रूप में वह चरित्र कई ऐसा सवाल उठाता है, जिसके आधार पर आज गांधी को आसानी से खारिज कर दिया जाता है. कुछ इसी तरह की कोशिइश कमल हासन ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म हे राम में की थी. एक एंटी-प्रोटेगोनिस्ट हमारे इतिहास के महानायक से टकराता है. बावजूद इसके कि वह फिल्म हिन्दी के सबसे बेहतरीन लेखको में से एक मनोहर श्याम जोशी ने लिखी- कई जगह कन्फ्यूजन क्रिएट करती है.

ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं, इनके जरिए हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते. यह भी कहा जा सकता है कि इन फिल्मों ने सोच को सिंपलीफाई करने का काम किया है. एक दूसरे तरीके से देखें तो हर बड़े विचार की अंततः सिंपलीफाई ही होना पड़ता है. तभी वह हमारे जीवन का हिस्सा बनता है. हमारे लीडर्स, हमारे लेखकों और विचारकों ने अगर नहीं किया, तभी सोसाइटी अपने डिलेमा का साल्यूशन खोज ही लेती है, चाहे उसके लिए सिनेमा की तरफ ही क्यों न जाना पड़े.

2 comments:

अजेय said...

आप का ब्लॉग फिल्म नाम की विधा में आस्था पैदा करता है. दिलीप चित्रे पर कुछ और सामग्री दे सकते हैं ?

Rajeev Ranjan said...

हिन्दी डेली जनसत्ता में आपके द्वारा लिखा ‘मूल्य बनाम संस्कृति’ टाइटल का पोस्ट ‘समांतर’ कॉलम के अन्तर्गत पढ़कर आपके ब्लॉग की तरफ झटपट भागा, यह आपके राइटिंग वैल्यू की ताकत थी। सर्च करने में थोड़ा टाइम लगा पर वहां एक प्रतिष्ठित न्यूजपेपर्स का घटियापा देख माइन्ड गर्म हो गया। उन्होंने हिन्दी शब्दों के प्रति प्रेम दिखाने के चक्कर में आपके पोस्ट का ऐसा का तैसा कर डाला था। हिन्दी में जितने शब्द उन्होंने लगाए उससे क्रिटिकल टर्मिनोलॉजी से आप बखूबी परिचित हैं। यह फिलिंग आपका ब्लॉग पढ़ते हुए हो गया। फिर अनावश्यक रूप से आम-बोलचाल में शुमार अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी भाषा में जबरिया डालकर ये खबरिया-भाषाविद क्या सिद्ध करना चाहते हैं-‘मूल्य, ग्रहण, पुनर्व्याख्या, भूमंडलीकरण, खुली अर्थव्यवस्था, भारतीय मूल्य, संतुलन, संदेश, सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक दबावों, निजी, जिंदगी, सामाजिक जीवन, शहरी युवा, समूह, सांस्कृतिक जड़ों, प्रतीकों की रचना, कुंठा, मानसिक विश्लेषण, चरित्र, उलझन, समाज, स्थिति, हल।’ इन अखबारनवीसों को हिन्दी-प्रेम की इतनी ही टान और महत्त्व की फिक्रमंदी थी तो ‘पॉपुलर कल्चर’, ‘नर्वस ब्रेकडाउन’, ‘कल्ट मूवी’, ‘डॉक्यू फिक्शन’, ‘स्प्लिट पर्सनलिटी’, ‘एंटी प्रोटेगोनिस्ट’ और ‘सिंपलीफाई’ को क्यों नहीं हिन्दी चोला पहनाकर प्रस्तुत किया। ब्लॉग-लेखक के रूप में आपने तो कहीं उसे अन्डरकोटेशन साइन प्रयोग करते हुए नहीं लिखा था। दरअसल, पाठकों को भाषा में भाषा-सम्बन्धी झांसा और प्रयोग-प्रचलन सम्बन्धी उठापटक देखनी हो तो हिन्दी अखबार अवश्य पढ़े, अंग्रेजी वालों को न तो हिन्दी का एक भी शब्द रोमन लिपि में छापने की आदत है और न ही उनकी कोई विवशता है जबकि हिन्दी वाले अंग्रेजी वालों को न छापे तो मानों ज्ञान/विचार/चिंतन का कोई खरका भी हाथ न लगे। यह कथन हास्यास्पद भले लगता हो किंतु है सत्य।
-राजीव रंजन प्रसाद, शोध-छात्र, बीएचयू, वाराणसी

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