August 23, 2010

पीपली लाइवः एक यथार्थ जो ‘हिट’ है















In the room the women come and go
Talking of Michelangelo.
From The Love Song of J. Alfred Prufrock by TS Eliot


देखते-देखते ‘पीपली लाइव’ सफल फिल्मों की कतार में खड़ी हो गई। दस करोड़ की लागत- जिसमें फिल्म के प्रमोशन का खर्च भी शामिल है- वाली ‘पीपली लाइव’ ने अपनी कीमत सेटेलाइट और म्यूजिक राइट्स के चलते वसूल ली। लिहाजा मल्टीप्लेक्स से हुई आमदनी को पूरी तरह से मुनाफे मे जोड़ा जा सकता है। फिल्म को ओपनिंग अच्छी मिली और बाद के दिनों में उसका मुनाफा बढ़ता गया। यह शायद किसी दिलचस्प शोध का विषय हो सकता है कि फील-गुड सिनेमा पसंद करने वाली मल्टीप्लेक्स की ऑडिएंस की पसंद कैसे रातों-रात बदल जाती है।

‘पीपली लाइव’ एक यथार्थवादी तेवर वाली फिल्म है, जो विदर्भ में फैली भुखमरी को अपना विषय बनाती है और मीडिया का मजाक उड़ाती है। इसमें सेल्यूलॉयड पर उतना ही कच्चा यथार्थ उतारा गया है, जैसा कि मीरा नॉयर की ‘सलाम बांबे’ और शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ में। मगर यह उन दोनों से इस मायने में अलग है कि जहां मीरा नॉयर अपनी फिल्म में भारतीय यथार्थ से त्रासद और शेखर कपूर ने स्तब्ध कर देने वाला प्रभाव पैदा किया, अनुषा रिज़वी उस ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ को टटोटलती है, जो आम भारतीय जिंदगी का एक हिस्सा है। यह वजह है कि फिल्म की गालियां वल्गर लगने की बजाय किरदारों की खीज को बड़े सहज तरीके से सामने रखती हैं।

देखें तो बतौर फिल्ममेकर यह अनुषा की एक बेहद सधी हुई और उम्दा रचना है, बावजूद इसके कि यह टीवी चैनलों की खिंचाई करते-करते झोल खा जाती है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद अनुषा कहीं न कहीं सोच और सरोकारों के उसी पाले में जा खड़ी होती हैं, जहां खड़े होने पर वह मीडिया को फिल्म में अपना निशाना बना रही होती हैं। यह फिल्म अपने पहले प्रमोशन से लेकर रिलीज होने के बाद तक पूरी तरह से मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को ख्याल में रखती है। बहुत समझदारी से बड़े शहरों और मेट्रो के बाजार को ध्यान में रखा गया है।

इसी बिंदु से हम यह भी समझ सकते हैं कि बिना किसी स्टार के थिएटर आर्टिस्ट और गांव के मूल निवासियों की अभिनीत फिल्म कैसे सफल हो जाती है। ‘पीपली लाइव’ मूलतः अपने आसपास के यथार्थ पर ‘सटायरिकल सेंस ऑफ ह्यूमर’ के साथ आगे बढ़ती है। इस शैली के साथ दिक्कत यह है कि यह यथार्थ की कड़वाहट को हल्का बना देती है। फिल्म विदर्भ के किसानों की दिक्कतों और तकलीफों से दर्शकों को कोई चोट नहीं पहुंचाती, बल्कि उनके लिए एक दिलचस्प तमाशा रचती है, जिसे वे किसी देसज तमाशे की तरह देख सकते हैं। मल्टीप्लेक्स के दर्शक के लिए यह बिल्कुल उसी तरह है, जैसे फोक आर्टिस्टों के मेले में संपेरों या फिर रस्सी पर चलते हुए नट को देखना। वे हमारे यथार्थ का एक हिस्सा हैं मगर वे हमारे संसार में कोई तोड़फोड़ नहीं करते। इस लिहाज से अपने असर के मामले में ‘पीपली लाइव’ बहुत साल पहले आई गोविंद निहलानी की फिल्म ‘पार्टी’ से भी कमजोर है, जहां पूरी फिल्म चल रही एक एलीट क्लास की पार्टी में एक किरदार की सिर्फ चर्चा कई लोगों को असहज कर देता है और अंत में दर्शकों को भी।

‘पीपली लाइव’ किसानों की समस्याओं को उपरी तौर पर छूती हुई आगे बढ़ जाती है। शायद फिल्मकार को अपनी इस कमजोरी का एहसास था, तभी अंत में स्क्रीन पर किसानों के विस्थापन के कुछ आंकड़े उभरते हैं। बुनियादी तौर पर आंकड़ों की ये बैसाखी फिल्म को सपोर्ट करने की बजाय उसे और कमजोर बनाती है। फिल्म खत्म हो जाती है और दर्शक मन पर बिना किसी बोझ के बाहर निकल आते हैं। बल्कि शायद वे खुद को मानसिक तौर पर ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने भारतीय जीवन का एक ऐसा यथार्थ देखा, जिसे वे सामान्य तौर पर भुला देना चाहते हैं या उसे अपनी चर्चा से बाहर कर चुके हैं। लिहाज यह फिल्म मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को उस अपराध-बोध से मुक्ति भी दिलाती है। यह यथार्थ उतना ही सुखद है- जितना कि मल्टीप्लेक्स के ठंडे हॉल में मुलायम सीट पर कोक के सिप लगाते- अधलेटे होकर सिनेमा देखना।

फिल्म की सफलता के मिथ के पीछे बेहद समझदारी या कहें चालाकी भरा प्रमोशन है। सोशल कंसर्न भी इमेज ब्रैंडिंग का एक हिस्सा हैं, इसे बड़ी कंपनियां भी समझ चुकी हैं और हमारे फिल्म स्टार भी। अगर फिल्म के प्रमोशन पर ठीक-ठाक पैसा नहीं खर्च किया गया होता तो शायद इस फिल्म को दर्शक मिलना तो दूर, इसे रिलीज होने के लिए भी इंतजार करना पड़ता। इस फिल्म को एक बड़े बैनर ने प्रोड्यूस और डिस्ट्रीब्यूट तो किया मगर हमें इस सवाल से रू-ब-रू होना चाहिए कि इससे इंडिपेंडेंट सिनेमा को क्या फायदा पहुंचा।

7 comments:

संगीता पुरी said...

ये यथार्थ तो सचमुच हिट है .. रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !!

Udan Tashtari said...

बढ़िया समीक्षा..जरुर देखेंगे.


रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

अजेय said...

पार, पोस्टर और पार्टी.....कॉलेज के दिनो देखी थी. दिल एक मर्तबा फिर से दहल सा गया. पार्टी का आतंक आज भी मुझ पर हावी है.इस के नायक की चर्चा मात्र होती है पूरी फिल्म में. अखीर मे क्षण भर के लिए वह स्क्रीन पर आता है और दर्शक को ज़िन्दगी भर haunt करता है.... एक दु:स्वप्न की तरह. आप ने पीपली के फिल्म कार का उथला पन तो पकड़ा ही है साथ में उस की धूर्तता का भी नोटिस लिया है. साधुवाद. इस रिव्यू से आज की पीढ़ी समानंतर सिनेमा आन्दोलन के मह्त्व को समझेगी और अच्ची सिनेमा का तमीज़ भी सीखेगी.

राजेश उत्‍साही said...

मैंने भी अपने ब्‍लाग गुल्‍लक पर पीपली पर कुछ लिखा है देखियेगा।

prabhat gopal said...

एक शानदार एनालिसिस. लेकिन पीपली लाइव को लेकर जो सबसे ज्यादा महत्पूर्ण बात है, वो ये है कि मीडिया अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए कैसे किसी भी बात को बाजार में तब्दील कर देता है. नत्था के आत्महत्या की खबर प्रचलित होने के बाद जिस तरह की रस्साकशी फिल्म में दिखाई गयी है, उसने अभी के यथार्थ का पूरा चित्रण कर दिया है. इसमें दिखाई गयी बातों को हम हर रोज अगल-बगल देखते हैं. हम भले ही आफिस में मखमली कुर्सी पर बैठ कुछ देर के लिए भारत के उस गरीब हिस्से को भूल जाएं,लेकिन ये हमारी जिंदगी के हिस्से हैं, इससे ये अहसास होता है. सरकारी उदासीनता किस हद तक पूरे ड्रामे के लिए जवाबदेह है, उसका भी इसमें चित्रण है. एक सटायर है, जो काफी सवाल छोड़ जाता है. खास कर तब जब प्रोमो में ये कहते दिखाया जाता है कि जिंदा रहोगे, तभी न इज्जत बचेगी. यानी भारत में गरीब इज्जत से ज्यादा जिंदा रहने की जद्दोजहद से जूझता रहता है.

prabhat gopal said...
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