April 22, 2013

बदलती दुनिया में महानायक

No comments:






I'm not questioning your powers of observation; I'm merely remarking upon the paradox of asking a masked man who he is.


फिल्म ‘वी फॉर वेंडेटा’ से

जेम्स बांड की फिल्म ‘स्काईफाल’ में एक दिलचस्प दृश्य है। बांड पहली बार अपने नए क्वार्टरमास्टर यानी क्यू से मिलता है। रिसर्च और डेवलपमेंट डिवीजन का पिछला हेड बुजुर्ग होकर रिटायर हो चुका है। उसकी जगह एक गीक से दिखने वाले युवा ने ले ली है। उसके और बांड के बीच बड़े अहम संवाद हैं। दोनों ही सागर की ऊंची लहरों के बीच पालों वाले एक पुराने शानदार जहाज को एक पेंटिंग में देखते हैं। दोनों के पास उस तस्वीर की अलग व्याख्या है। क्यू कहता है, "अनुभवी होना कुशल होने की गारंटी नहीं है।" तो बांड का जवाब आता है, "हां, जैसे युवा होना मौलिकता की गारंटी नहीं है।"

बांड की नई फिल्म ‘स्काईफाल’ इन्हीं दो विचारधाराओं के बीच एक बहस है। फिल्म इस बात पर काफी जोर देती है कि तेजी से बदलती दुनिया में पुराने मूल्यों पर यकीन बनाए रखना होगा। तभी सीक्रेट सर्विस की हेड एम खुद पर लगे आरोपों के जवाब में टेनीसन की कविता 'यूलीसिस' की कुछ पंक्तियां पढ़ती है, जिसमें पुराने ब्रिटिश दौर का नास्टेल्जिया झलकता है। उस वक्त जब पृष्ठभूमि में फिल्म का खलनायक सीधा प्रहार करने जा रहा होता है, एम उस कविता की आखिरी पंक्तियां बोल रही होती है-

वी ऑर नाट नाऊ दैट स्ट्रेंथ व्हिच इन ओल्ड डेज़
मूव्ड अर्थ एंड हैवेन, दैट व्हिच वी आर, वी आर--
वन इक्वेल टेंपर आफ हेरोइक हार्ट्स
मेड वीक बाइ टाइम एंड फेट, बट स्ट्रांड इन विल
टु स्ट्राइक, टु सीक, टु फाइंड, एंड नाट टु यील्ड

मगर जेम्स बांड हो या 'द डार्क नाइट राइजेज' का बैटमैन, वे बदलते वक्त की चुनौतियों के सामने थक रहे हैं। कई साल पहले नाइन-इलेवन के हादसे के बाद मार्वल कॉमिक्स के एक स्पेशल इश्यू में स्पाइडरमैन ध्वस्त ट्विन टावर के मलबे के सामने असहाय खड़ा नजर आता है। अमेरिकी पॉपुलर कल्चर के इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ होगा कि उनके महानायक बेन, जोकर या लक्स लूथर जैसे अपने चिर-परिचित काल्पनिक खलनायकों से लड़ने की बजाय वास्तविक दुनिया की किसी चुनौती के सामने खड़े हों। वह महज एक शुरुआत थी। महानायकों के गुरूर तोड़ने के लिए सिर्फ आतंकी हमले काफी नहीं थे, बल्कि आर्थिक मंदी की मार और पश्चिमी दुनिया के बरक्स नई महाशक्तियों के उदय ने इन्हें और बौना बना दिया।

सुपरहीरो कमजोर पड़ रहे थे।

सन् 2008 के झटकों के बाद 2011 से विश्व में फिर से आर्थिक मंदी सिर उठाने लगी। अब तो यह बाकायदा माना जा रहा है कि अगर यूरोप में आर्थिक विकास की गति रफ्तार नहीं पकड़ती है तो एक नया संकट फिर से पश्चिमी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा। 'द डार्क नाइट राइजेज' में पश्चिमी अर्थव्यवस्था का यह संकट साफ तौर पर नजर आता है। बैटमैन की गुप्त पहचान वाले ब्रुस वेन को इसी सिरीज की पहले आई फिल्मों की तरह प्रभावशाली बिजनेसमैन नहीं दिखाया गया है। उसका कारोबार डांवाडोल है। इतना ही नहीं जब खलनायक बेन गोथम सिटी स्टॉक एक्सचेंज पर कब्जा जमा लेता है तो बैटमैन के हाथ से बची-खुची संपत्ति भी चली जाती है और वेन एंटरप्राइजेज का शेयर गिर जाता है। यह ऐसे कारोबारी की कहानी है जो अपने बुरे दौर से गुजर रहा है।
पश्चिम में बढ़ती बेरोजगारी ने युवाओं में निराशा भर दी है। ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों से पढ़ने वाले 51 फीसदी छात्र एशिया जा रहे हैं, जो वहां नहीं जा रहे वे ऑस्ट्रेलिया का रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि इस साल हमें ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ में सुपरहीरो का एक नया अवतार दिखा। मुखौटे के पीछे यह नायक ज्यादा मानवीय है। आम युवा की तरह वह थोड़ा उतावलापन दिखाता है और गलतियां भी करता है। यह स्पाइडरमैन का जेन-नेक्स्ट अवतार है। हॉलीवुड की भाषा में इसे 'री-बूट' कहा जाने लगा है और क्रिस्टोफर नोलन इसके उस्ताद बन गए हैं,  जिन्होंने पहले बैटमैन को अपनी तीन फिल्मों की श्रृंखला में री-बूट किया और अब ‘मैन आफ स्टील’ में सुपरमैन के कैरेक्टर को नई जेनरेशन के लिए री-बूट कर रहे हैं। जिन्होंने इस फिल्म का प्रोमो देखा है, उन्हें यह सुपरमैन श्रृंखला की पिछली फिल्मों से अलग, गहरे इमोशंस से भरा और एक त्रासद आधारभूमि लिए आता है। यहां सुपरमैन अपने अस्तित्व और ‘एलिएनेशन’ के सवालों से जूझ रहा है।

लेकिन असल पेचीदगियां उन मूल्यों की हैं, जिन्हें आधार बनाकर इन नायकों ने खुद को गढ़ा था। जब क्यू कहता है, "मैं अपने पाजामे में लैपटॉप के सामने बैठकर चाय की चुस्की लगाते हुए दुश्मन के लिए इतनी तबाही मचा सकता हूं, जितनी तबाही फैलाने में आपको एक बरस लग जाएंगे।" तो यह वाकई बांड के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। नई टेक्नोलॉजी, नया मीडिया और नई विश्व व्यवस्था- इन सबके बीच महानायकों के लिए कहां जगह है?

एलन मूर के ग्राफिक नावेल ‘वाचमेन’ की तरह ये सुपरहीरो मानो अपने रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहे हैं।  मूर ‘वॉचमेन’ के जरिए अपने पाठकों को एक वैकल्पिक इतिहास में ले जाते हैं, जहां वियतनाम युद्ध जीतने में अमेरिका की मदद करने के लिए 1940 और 1960 के दशक में सुपरहीरो उभरते हैं। देश सोवियत संघ के साथ एक परमाणु युद्ध के करीब पहुंच रहा है और पोशाकधारी सुपरहीरो या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या सरकार के लिए काम कर रहे हैं। इसी नाम से बनी फिल्म भी काफी पॉपुलर हुई, जहां नायकों को पहचान के संकट और निजी उलझनों से जूझते हुए देखा गया।

कुछ-कुछ इसी तरह गैजेट्स की मदद से दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले बांड को भी ‘स्काईफाल’ में सिर्फ साहस का सहारा लेना पड़ता है। पिछली कॉमिक्स श्रृंखला, उपन्यासों और फिल्मों की तरह यह बांड चतुर-चालाक और निर्मम नहीं है। उस पर अतीत का बोझ है और सामने भविष्य की चुनौतियां हैं। “तुम्हें क्या किसी धमाके के साथ फटने वाले पेन की उम्मीद थी?” फिल्म में क्यू का व्यंगात्मक प्रश्न बांड से टकराता है, “अब यह सब बीते जमाने की बातें हो गईं।” यह वैसा ही बदलाव है जैसे सुपरमैन की गुप्त पहचान वाले क्लार्क केंट अखबार की नौकरी छोड़नी पड़ी। पिछले दिनों डीसी कॉमिक्स के नए अंक में केंट ने दशकों से चली आ रही रिपोर्टर की पहचान को बदलने का फैसला लिया। पॉपुलर कल्चर में यह एक ऐसा मोड़ था, जिसने अचानक मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। खास तौर पर जब पॉपुलर कल्चर का यह आइकन पारंपरिक मीडिया की आलोचना कर रहा हो।

क्लार्क का ‘डेली प्लैनेट’ के दफ्तर में अपने बॉस के साथ बहस होना कोई नई बात नहीं है। मगर इस बार प्रसंग कुछ अलग है। कॉमिक्स के इस अंक में एक जगह खचाखच भरे न्यूज़रूम में तीखी बहस के दौरान केंट कहता है, "मुझे सिखाया गया है कि तुम अपने शब्दों से नदी की धारा बदल सकते हो और वो कितना भी गहरा राज़ हो, सूरज की तेज़ रोशनी में वह टिक नहीं सकता।"  आगे उसके शब्दों में निराशा है, "...तथ्यों की जगह निजी विचारों ने ले ली है, और सूचना का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है। रिपोर्टर तो सिर्फ़ स्टेनोग्राफ़र होकर रह गए हैं। और मैं अकेला नहीं हूँ जो इस स्थिति से निराश हैं।" माना जा रहा है कि अब शायद क्लार्क केंट ब्लॉग लेखन करे या हफ़िंग्टन पोस्ट जैसी कोई वेबसाइट शुरु कर दे।

यह सारे बदलाव एक बदलती हुई विश्व व्यवस्था के संकेत हैं। जहां वास्तविक जीवन में जूलियन असांज जैसा दिलचस्प शख्स किसी नायक की तरह उभरता है। जो एक यायावर जीवन जीता है। करीब चालीस बरस के असांज एक बैग में उनके कपड़े होते हैं और दूसरे में लैपटॉप। और दुनिया में जहां भी उन्हें युद्ध संबंधी सूचना मिलने की संभावना रहती है, वे चल पड़ते हैं।


शायद यही वजह है कि हर बार ये महानायक बदलती विश्व व्यवस्था के प्रति अनुकूल रुख नहीं अपनाते। क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म 'द डार्क नाइट राइजेज' में कुछ बड़े ही स्पष्ट राजनीतिक संदेश छिपे हैं। फिल्म का खलनायक बेन गोथम सिटी पर कब्जा जमाने और अमीरों को निकाल बाहर करने के लिए आम लोगों का नेतृत्व करता है। उसने अपना साम्राज्य शहर के नीचे सीवर लाइन की तलछट में फैला रखा है। फिल्म में बेन एक कानून के तहत जेल में बंद कैदियों को भी छुड़ाता है। यह 11 सितंबर की घटना के बाद अमेरिका में लागू पेट्रियट कानून से मिलता-जुलता है। इसका विरोध होता रहा है कि क्योंकि पुलिस को अत्यधिक अधिकार सौंपने से लोगों की निजी जिंदगी में उनका दखल होने लगा है।

फिल्म का सेकेंड हाफ सर्दियों के अवसाद भरे दिनों जैसा है। इस दौरान कभी पावर और सत्ता का केंद्र रहे लोगों की जनता दरबार में पेशी होती है और उन्हें मौत की सजा भी सुनाई जाती है। फिल्म के इस रुख ने तत्काल पश्चिमी मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और इसे ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन की आलोचना माना गया। हालांकि ‘रॉलिंग स्टोन’ मैगजीन को दिए इंटरव्यू में नोलन ने आंदोलन की आलोचना से इनकार किया। उन्होंने कहा, 'यह फिल्म ऐसा कुछ नहीं कहना चाहती।'  जाहिर है कि ये महानायक बदलाव को नकार नहीं सकते मगर उसे जस का तस स्वीकारना भी नहीं चाहेंगे। उस बदलाव को स्वीकारने से एक महास्वप्न चटखने लगता है। 

मगर कुछ सुपरहीरो ऐसे भी हैं जो इस तेजी बदलती दुनिया में जगह बना रहे हैं। एलन मूर के ग्राफिक नावेल पर आधारित फिल्म 'वी फॉर वेंडेटा' का नायक सोलहवीं सदी के विद्रोही गाइ फॉक्स का व्यंगात्मक मुस्कान वाला मुखौटा लगाए रखता है। इस ग्राफिक नावेल में 1980 के दशकों में युनाइटेड किंगडम के मनहूस भविष्य की कल्पना की गई है। उस दौर का एक रहस्यमय क्रांतिकारी जो अपने आपको "वी" कहता है, अधिनायकवादी सरकार को तबाह कर देने के लिए काम करता है। वह एक मुखौटा लगाता है। सन 2005 में आई इस फिल्म के जरिए यह मुखौटा इतना पॉपुलर हो गया कि आज यह सारी दुनिया में विरोध का प्रतीक बना हुआ है। चाहे वह भारत में नई दिल्ली और बंगलुरु की सड़कों पर इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ चल रहा आंदोलन हो या फिर आक्युपाई वाल स्ट्रीट आंदोलन।

एक और महत्वपूर्ण और दिलचस्प बदलाव सामने आ रहा है। कॉमिक्स की दुनिया पर अब पश्चिम का वर्चस्व भी खत्म हो रहा है। मिडिल ईस्ट के साइकोलॉजिस्ट डा.नैफ अल मुतावा की 99 नाम से शुरु कॉमिक्स श्रंखला के महानायक चरित्र इसलामिक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बराक ओबामा तक ने इसलाम की शिक्षा और सहिष्णुता की ओर युवाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए इसकी सराहना की है। पिछले दो साल से दिल्ली में लगने वाले कॉमिक कान में सूफी कॉमिक्स का स्टाल भी सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। सन् 2012 में भारतीय एनीमेशन और कॉमिक्स कंपनी रोवोल्ट ने ‘मेटाफ्रैक्ज’ नाम से एक कॉमिक्स शुरु की। इसमें कुछ टीनएजर्स और बच्चे हैं। हर बच्चा दुनिया के किसी खास कोने का है और यह एक मल्टीएथिकल ग्रुप की तरह काम करता है। इसमें एक मुंबई का रहने वाला है तो दूसरा यूरोप का। एक इजिप्ट से आया है तो एक रूस से। कई साल पहले शेखर कपूर और दीपक चोपड़ा के प्रयास अब मजबूत होते दिख रहे हैं। उनकी लिक्विड कॉमिक्स के जरिए भारतीय मिथक का मार्डन रूपांतरण धीरे-धीरे पश्चिम में लोकप्रियता हासिल कर रहा है।

वापस चलते हैं फिल्म ‘स्काईफाल’ के शुरुआती दृश्यों की तरफ। जब लोमहर्षक एक्शन सीक्वेंस के दौरान- यह खतरा होते हुए भी बांड को गोली लग जाएगी, एम गोली चलाने का आदेश देती है। गोली बांड को ही लगती है और स्क्रीन पर क्रेडिट्स उभरने लगते हैं। पार्श्व में उदासी भरा गीत गूंजता है, “दिस इज़ द एंड। होल्ड योर ब्रेथ एंड काउंट टु टेन।”

पश्चिम के नायक खत्म नहीं हुए हैं पर अपनी सांस थामकर उल्टी गिनती जरूर गिन रहे हैं।
____________________________________________________________

'उद्भावना' में प्रकाशित

February 15, 2013

दुनिया जो भीतर गुम है कहीं

No comments:


तेरे बिना ज़िंदगी से कोई, शिकवा, तो नहीं,
तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन, ज़िंदगी, तो नहीं

गुलज़ार (फिल्म 'आंधी' से)


सत्तर के दशक की कुछ फिल्में एक अलग और सुहानी सी दुनिया रचती हैं। ये सत्तर के दशक का मध्यम वर्ग था। अपनी लाचारियों, परेशानियों और उम्मीदों में डूबता-उतराता। कभी हम 'गोलमाल' जैसी फिल्मों में उस पर हंसते थे तो कभी घरौंदा जैसी फिल्मों में उसकी मजबूरियाँ हमें उदास कर जाती थीं।

मगर यहां मैं उस दुनिया को याद नहीं करने जा रहा, मैं यह ध्यान दिलाने जा रहा हूं कि वह संसार दरअसल आज भी हमारे भीतर ही कहीं गुम पड़ा है। जब अकेली रात को हम कभी गुलज़ार को सुनते हैं तो बंद आंखों के आगे एक फिल्म सी चलने लगती है। इस फिल्म में न तो अमोल पालेकर हैं, न विद्या सिन्हा और न बिंदिया गोस्वामी। यहां हम नजर आते हैं: सर्दियों की गुनगुनी धूप सेंकते, मई की धूल उड़ती सड़क पर फेरी वाले की भटकती आवाज, शाम को मद्धम होते उजाले में झींगुरों की झनकार।

जिंदगी में धीमापन जरूरी है। इस धीमेपन में ही हम अपनी आवाज को सुन पाते हैं। अपनी आवाज को सुनना दरअसल क्या है। यह दरअसल परिवर्तित होती वस्तुओं, जीवन और खुद की गति को समझना। चेक लेखक मिलान कुंदेरा ने अपने उपन्यास 'स्लोनेस' में धीमेपन को याद रखने और रफ्तार को भूल जाने के एक्ट के रूप में परिभाषित किया है। गांधी ने एक बार कहा था, "पैदल चलने से सत्य को हम ज्यादा करीब से जान पाते हैं।" इस बात का मर्म तभी समझा जा सकता है जब हम यह समझते हों कि जीवन का धीमापन किस तरह से हमें खुद के करीब ले जाता है।

मुझे लगता है कि आने वाले वक्त में हम जीवन के धीमेपन को दोबारा से हासिल करने की कोशिश करेंगे। हम धीमेपन के कुछ पल अपनी जिंदगी के जोड़ने की कोशिश करेंगे। स्लोनेस को अपने जीवन में लाना एक मुश्किल काम है। ठहराव आपकी जीने की अवधि को बढ़ाता है। वह आपके भीतर छिपे ब्रह्मांड से आपको रू-ब-रू कराता है और बाहर के ब्रह्मांड से जोड़ता है।

सत्तर का दशक दरअसल उस दुनिया की याद दिलाता है जब लोगों से हमारे संबंध वास्तविक थे, वर्चुअल नहीं। उस वक्त को फिक्शन से परे उन गीतों में महसूस कर पाते हैं, जिनका अधिकांश गुलज़ार ने रचा है। एक बार फिर से उन सच्चे मोतियों में से किसी एक को चुनें। अपनी आंखें बंद करें और पुरानी यादों में खुद को डुबो दें।

गुलज़ार के शब्दों में-

आज अगर भर आई है
बूंदे बरस जाएंगी
कल क्या पता किनके लिए
आँखें तरस जाएंगी
जाने कब गुम हुआ,
कहाँ खोया
इक आंसू छुपा के रखा था
तुझसे...

May 16, 2012

हमने इतिहास को देखा है...

2 comments:

जो अपने लिए सोचीं थी कभी वो सारी दुआएं देता हूँ... 
साहिर (फिल्म 'कभी-कभी 'से)

इस बार अनजाने में ही हाथ लग गए एक नौजवान के कुछ नोट्स शेयर कर रहा हूं. नाम और लोकेशन का पता नहीं, गौर से पढ़कर देखें शायद वह आपके पड़ोस में ही कहीं हो..
.

कई बार यह ख्याल आता है कि दुनिया को हिला देने वाली तारीखों के बीच अगर हम होते तो कैसी वैचारिक जद्दोजहद से गुजर रहे होते. शताब्दी की शुरुआत कुछ ऐसी ही उथल-पुथल से भरी थी. दो विश्वयुद्ध, उपनिवेशों का खात्मा, जीने का तरीका बदल देने वाले अविष्कार और सोसाइटी को बदल देने वाले आंदोलन. युरोपियन कंट्रीज के कॉफी हाउस में कभी न खत्म होने वाली बहसें. युद्ध के समर्थन में और युद्ध के खिलाफ, कला के समर्थन में और कला के खिलाफ, सत्ता के समर्थन में और सत्ता के खिलाफ.

हमने किसी बहुत बड़े मकसद के लिए सड़कों पर निकलने वाला जनसमूह नहीं देखा, उसके बारे में सुना जरूर, हमने किसी अविष्कार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देने वाले वैज्ञानिकों को नहीं जाना, उनके बारे में पढ़ा जरूर. हमने तमाम महान विचारकों को पढ़ा, उन पर बहस की, उनके बारे में दूसरों को बताया, उन पर लिखा, मगर किसी बड़े विचारक से कदम मिलाकर चलने का मौका हमें नहीं मिला. हमने बड़े विचारों को छोटे-छोटे स्वार्थों में बदलते देखा. बेमतलब की बातों पर खून-खराबा होते देखा. अपनी इस उम्र में हमने कोई इतिहास नहीं गढ़ा.

मगर दुनिया तो बदल रही थी, बदलती रही. दुनिया में शक्ति के संतुलन हमारे सामने ही डगमगाए. बचपन में पढ़ी कॉमिक्स की फंतासी जीवन में शामिल होने लगी. अस्सी के दशक में भविष्य के नायक फ्लैश गार्डेन को वीडियो फोन का इस्तेमाल करते दिखाया जाता था, जो हमारे लिए हैरानी थी. तब तो मोबाइल भी नहीं आए थे. टेलीग्राफ ऑफिस का विंडो देखते-देखते बंद हो गया. टाइपराइटर कचहरी तक सिमट गया. हमने वास्तविक दुनिया के पैरेलल एक वर्चुअल रियलिटी खड़ी कर ली. हमारा मन टुकड़ों में बंटता चला गया. हमने गंभीरता ओढ़ने वालों का मजाक उड़ाकर कहा कि हम उनसे ज्यादा संज़ीदा हैं.

हमने बड़ी-बड़ी बातें करनी बंद कर दीं. हमने छोटे-छोटे काम करने शुरु किए. जिनसे हमारी दुनिया में बहुत छोटे सही मगर बदलाव होने लगें. इस उम्मीद में शायद फिर कथाओं का कोई ऋषि चींटी का प्रयास देखकर चौंक पड़े. हमने वैल्यूज पर यकीन करना छोड़ दिया, क्योंकि उनकी आड़ में सबसे ज्यादा गुनाहगार छिपे हुए थे. हमने खुद के भीतर मूल्य तलाशने शुरू किए. हमने ईमानदारी से अपने बारे में सोचना शुरु किया. हमने दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर परोपकारी बनने की बजाए स्वार्थी बनना स्वीकार किया. हमने दोस्त बनाए, हमने उन्हें भुला दिया, हम छिप कर रोए मगर अपने दुख को दुनिया के सामने नाटक बनाकर नहीं पेश किया.

हमने महसूस किया कि दुनिया तेजी से बदल रही थी. सड़कों पर आम चहल-पहल थी मगर खिड़कियों के पीछे हलचल थी. हवा में एसएमएस, सोशल नेटवर्किंग, ब्लागिंग की अदृश्य खिड़कियां बन रहीं थीं, उन खिड़कियों के पार एक नई दुनिया थी. दोस्त थे और खुद को अभिव्यक्त करने के मौके थे. एक छोटी सी चिड़िया की चहचहाहट दुनिया भर में फैल गई. खुद का चेहरा, खुद की जिंदगी, एक खुली किताब बन गई. हम अकेले होते हुए भी अकेले नहीं रह गए. महानगरों में अपने कमरे में कैद अकेले मुस्कुराते रहे, ठहाके लगाते रहे, उदास होते रहे, झुंझलाते रहे. और दुनिया में लाखों चेहरों पर कुछ ऐसे भी भाव थे. हम एक ऐसी दुनिया में थे, जहां की हर गली हर किसी के घर को पहुंचती थी. न तो रास्ते में पर्वत थे, न महासागर और दो राष्ट्रों का अहंकार.

की-बोर्ड पर दौड़ती उंगलियों ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के मुखिया को चौंका दिया. हमने मधुमक्खियों की तरह मेहनत की. कई बार तो रातों को जागकर और लोकल ट्रेन-बसों में उबासी लेते हुए. हां, इसी से तो हमारे भीतर भरोसा जगा है. हमने टेक्नोलॉजी को विकसित होते और उसे खत्म होते देखा है. हमने अपने आसपास फैली दहशत, बारूद के धुएं और अनिश्चित भविष्य के बीच हंसना सीखा है. हां, हम यह कह सकते हैं कि हमने इतिहास को देखा है.

भरोसा रखें, हमने इस नए इतिहास को पढ़ना शुरु कर दिया है. जिस दिन हम उसे शुरु से आखिर तक समझ जाएंगे हमें यकीन है कि सब कुछ बदल जाएगा.
______________________________________________________

बीते साल एक टेब्लॉयड के एडिट पेज पर प्रकाशित

February 17, 2012

दादा साहेब फालके से सीखें...

No comments:
इन दिनों दादा साहेब फालके के बारे में कुछ पढ़ना-समझना शुरु किया था। इसी दौरान यह दिलचस्प स्लाइड-शो दिखा, जिसे आप सभी के साथ साभार शेयर कर रहा हूं।

January 21, 2012

सोशल मीडिया पर ‘अनायकों’ की महागाथाएं

2 comments:
काफ्का की कहानी ‘मेटामार्फोसिस’ का बेहद मामूली जिंदगी जीने वाला नायक एक सुबह जागता है और खुद को तिलचट्टे में बदला हुआ पाता है। मगर 2011 की एक सुबह इलाहाबाद के गोविंद तिवारी की नींद खुलती है तो पता चलता है कि वे रातों-रात एक ऑनलाइन सेलेब्रिटी में बदल चुके हैं। उनका नाम विश्वव्यापी ट्विटर ट्रेंड में शामिल हो चुका है। ट्विटर ट्रेंड में गोविंद तिवारी का नाम भारत में पहले और विश्व में पांचवें स्थान पर चमक रहा था।

हर कोई हैरान था और यह जानना चाहता था कि गोविंद तिवारी आखिर है कौन? शायद उतना ही मामूली इंसान जितना कि लगभग सौ साल पूर्व प्रकाशित उस कहानी का नायक। इलाहाबाद में फाफामऊ का यह लड़का सिर्फ पलक झपकाती तस्वीरों वाले अपने रंगबिरंगे एनीमेशन से भरे ‘सबसे बुरे डिजाइन वाले’ ब्लाग के कारण इंटरनेट पर छा गया और उस पर बने चुटकुले ‘रजनीकांत जोक्स’ को टक्कर देने लगे।

गोविंद तिवारी को मिली यह लोकप्रियता 14 साल की रेबेका ब्लैक की याद दिलाती है, जिसके ‘फ्राइडे’ गीत को यू-ट्यूब पर करीब 20 लाख बार देखा जा चुका है और 50 हजार से ज्यादा लोगों ने उसे नापसंद किया है। लगभग हर किसी ने इस गीत और उसके वीडियो की आलोचना की। उनके गीत को दुनिया का सबसे घटिया गीत बताया गया। यहां तक कि रेबेका को गुमनाम धमकियां भी मिलीं कि अगर उसने अपना वीडियो यू-ट्यूब से नहीं हटाया तो उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा। हालांकि बाद में लेडी गागा जैसी पॉप सिंगर्स ने रेबेका को सराहा और उसकी प्रतिभा को मौलिक बताया। यह कुछ-कुछ एक सामूहिक मज़ाक जैसा लगता है, जैसे शेरिडॅन सिमोव की किताब ‘व्हाट एवरी मैन थिंक अबाउट अपार्ट फ्राम सेक्स’ के साथ हुआ। दो सौ पृष्ठ की इस किताब के भीतरी पृष्ठ बिल्कुल कोरे थे। जाहिर तौर पर यह एक मज़ाक था मगर अमाजोन में इसकी बिक्री का ग्राफ डैन ब्राउन और जेके रोलिंग से भी ऊपर चला गया।

यह तो बात हुई मज़ाक की, लौटते हैं कुछ गंभीर मसलों पर। अभी कुछ ही दिन बीते ‘ब्रोकेन मार्निंग’ नाम से ब्लागिंग करने वाली एक गुमनाम सी दक्षिण भारतीय युवती ने ‘ओपन लेटर टु ए डेल्ही ब्वाय’ नाम की पोस्ट से उत्तर भारतीयों की दिखावे की संस्कृति पर तंज किया तो उसके ब्लाग और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रतिक्रियाओं की भरमार लग गई। वह ट्विटर पर सबसे हॉट ट्रेंड बन गई न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व के ट्विटर ट्रेंड्स में भी उस पर चल रही बहस का असर दिखा। उसकी इस पोस्ट पर ढाई हजार से उपर कमेंट्स देखे जा सकते हैं। हालांकि इस बहस के मिज़ाज का हल्कापन बरकरार रहता है। इंटरनेट पर इन्हीं दिनों एक जोक प्रचलित हुआ, “पहले बम-ब्लास्ट, फिर भूकंप और अब मद्रासन का ब्लाग... दिल्लीवासी आखिर कितने झटके सहेंगें?”

अगर आप गौर करें तो एक बात इन सबमें कॉमन है, ये सारे गुमनाम से चेहरे हैं। ‘अ फेस इन द क्राउड’, मामूली इंसान, भीड़ में कहीं धक्का भी लगे तो आप पलटकर न देखें। दूसरी दिलचस्प बात यह है कि इन्होंने कुछ भी असाधारण नहीं किया। न ही वे ऐसा कुछ करने का दावा करते हैं। गोविंद तिवारी और रेबेका ब्लैक की उकता देने वाली अति-साधारणता ही इंटरनेट पर मज़ाक बनकर छा गई। मगर इसके बाद यह घटना साधारण नहीं रह जाती। एक मद्रासी लड़की अपनी रोजमर्रा के अनुभवों को अपने पर्सनल ब्लाग में लिखती है और वह एक तीखी बहस में बदल जाता है। जो उस वक्त चल रही तमाम राजनीतिक-सामयिक घटनाओं पर भारी पड़ता है। इन परिघटनाओं को हम कैसे समझ सकते हैं? क्या यह सिर्फ किसी का मज़ाक उड़ाने की हमारी आदत का नतीजा भर है, जैसा कि सतही तौर पर देखने में महसूस भी होता है, या बात कहीं आगे जाती है।

आइए सन 2007 में आई फिल्म ‘भेजा फ्राई’ को याद करते हैं। यह मल्टीप्लेक्स की शुरुआती सफल ऑफबीट फिल्मों में भी गिनी जाती है। फिल्म में दर्शक भारत भूषण बने विनय पाठक पर खूब हंसे, मगर उस हंसी के पीछे कहीं-न-कहीं एक बेहद मामूली इंसान की सफलता भी थी। उसकी बेवकूफियां सभ्य समझी जाने वाली सोसाइटी का हास्यास्पद पहलू दिखाती हैं। ‘मैं आज़ाद हूं’ के नायक को रास्ता दिखाने के लिए एक मामूली से इंसान से जबरन महापुरूष में बदलना पड़ता है, मगर ‘पीपली लाइव’ का नायक अंत तक लाचार बना रहता है, वह महान बनाए जाने के प्रति विद्रोह कर देता है और वहां से भाग खड़ा होता है क्योंकि उसकी सहज बुद्धि उसे इसके पीछे चल रही साजिशों के प्रति सचेत करती रहती है। यानी चीजों को देखने की निगाह बदल गई है। एलीट क्लास की निगाह से सोसाइटी को देखने की बजाय आम लोगों की निगाह से देखना।

यह दरअसल एक सामूहिक तोड़फोड़ है। परंपरागत प्रतिमानों को बदलने की एक जिद है। मगर दिलचस्प बात यह है कि इन प्रयासों के कोई मुखिया, अगुआ या नेता नहीं हैं। जैसे बहती हवाओं का कोई स्रोत नहीं होता और वो आंधी बन जाती हैं। यह नया मीडिया है, जो सब कुछ तेजी से बदल रहा है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण शायद आक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट आंदोलन है। विश्व के इतिहास में शायद यह पहला आंदोलन है जिसका कोई नेता नहीं है। इसके पीछे वही आम लोग हैं तो जापान में आई सुनामी के कुछ ही क्षणों बाद सूचना और खबरों का सबसे विश्वसनीय स्रोत बन जाते हैं, ये वही हैं जो मुंबई ब्लास्ट में मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं। धमाकों की अफरा-तफरी के बाद जब वहां का मोबाइल नेटवर्क जाम हो गया तो ट्विटर पर मदद देने के लिए हाथ बढ़े। लोगों ने ठहरने के लिए अपने घर का पता, घर पहुंचाने के लिए अपनी कार और जरूरत पड़ने पर रक्तदान तक का प्रस्ताव दिया। अगर इंटरनेट पर मीडिया एक सामूहिक सामाजिक परिघटना में बदल चुका है तो फिर सौंदर्यशास्त्र से लेकर गुणवत्ता के मानदंड पुराने क्यों रहें?

कारनेल यूनीवर्सिटी ने एक खास प्रोग्राम की मदद से ट्विटर पर अपने नवीनतम शोध में यह साबित कर दिया कि सारी दुनिया में लोगों के मूड और मिजाज का एक खास पैटर्न होता है, जिसे पहचाना जा सकता है। यह लगभग तय है कि धीरे-धीरे सोशल मीडिया ही लोगों की सोच का पैमाना बनता जाएगा। यह किसी भी समाज की एक विराट धक-धक में बदल जाएगा या किसी हद तक बदल चुका है। शायद समाज विज्ञानियों को इसे नए सिरे से समझने की जरूरत पड़ेगी। इस धड़कन ने तमाम रास्ता दिखाने वाले मसीहाओं, इंटैलेक्चुअल समझे जाने वाले दंभी लोगों, गुरूर से भरे लेखकों और कलाकारों को उनकी सीमाओं का अहसास करा दिया है। गोविंद तिवारी और रेबेका ब्लैक खुद सारी जिंदगी अपनी लोकप्रियता की वजह नहीं समझ सकते। वे सिर्फ एक प्रतीक हैं, खास समझे जाने के प्रति विद्रोह का। एक आम आदमी की ताकत का एहसास कराता इसलिए नहीं कि वह खास है, इसलिए कि उसे ‘आम’ ही होना चाहिए।

December 01, 2011

विश्व बाजार में भारतीय मिथक

No comments:
इंडियन माइथोलॉजी इन दिनों उन सभी लोगों को आकर्षिक कर रही है जो एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में कुछ नया करना चाहते हैं. इस क्षेत्र में न्यू एज स्प्रिचुअल गुरु दीपक चोपड़ा और निर्देशक शेखर कपूर बीते कई सालों से काम कर रहे हैं. उनके तैयार किए गए ग्राफिक नॉवेल पर फिल्म निर्माण की भी तैयारी है.

शुरुआत में यह प्रोजेक्ट वर्जिन ग्रुप के रिचर्ड  ब्रान्सन के साथ आरंभ हुआ. मगर कुछ साल के अंतराल पर करार टूट जाने के बाद इस टीम ने लिक्विट कॉमिक्स के नाम से अपने सभी टाइटिल जारी कर दिए. इस सिरीज की खास बात है, जाने-माने फिल्म निर्देशकों को इसकी रचना-प्रक्रिया में शामिल करना- जिनमें गॉय रिची, जॉन वू और शेखर कपूर जैसे नाम शामिल हैं.

इस टीम ने रामायण और महाभारत की कथाओं के आधुनिक संस्करण भी प्रस्तुत किए हैं. यह एक शुरुआत हो सकती है, भारतीय विषयों को अंतर्राष्ट्रीय फलक तक ले जाने की. ठीक उसी  तरह जैसे जापान का मंगा एनीमेशन की एक शैली बनकर दुनिया पर छा गया या चीन के मार्शल आर्ट सिनेमा ने दुनिया के बाजार पर कब्जा कर लिया.

यहां प्रस्तुत है- दीपक चोपड़ा की काली पर आधारित कॉमिक्स का डिजिटल संस्करण-

November 22, 2011

हमें ये सीक्वेल चाहिए!

2 comments:
देखते-देखते हिन्दी फिल्मों के सीक्वेल बनने लगे. सबसे पहले सीक्वेल के बारे में पता लगा स्टारवार्स सिरीज से. किशोरावस्था का ज्यादा हिस्सा सीक्वेल देखते ही गुजरा. एंपायर स्ट्राइक्स बैक पहले देखी फिर रिटर्न आफ जेडाइ- मगर स्टारवार्स आज तक न देख सका. कुछ और सीक्वेल देखे- कई बार खराब, जैसे- डाइहार्ड का दूसरा भाग और कई बार इतने शानदार कि दांतो तले उंगलियां दबाए रह गए, जैसे- मैड मैक्स का पार्ट टू. इन दिनों फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसकी अगली कड़ी का ऐलान कर दिया जाता है. ऐसे में कई बार कुछ ऐसी फिल्मों के नाम मन में घूम जाते हैं, जिसके बारे में अक्सर लगता है कि इनका सीक्वेल बनना चाहिए. यहां मैं ऐसी ही चार फिल्मों की चर्चा करना चाहता हूं. हर बेहतर फिल्म अपना खुद का एक संसार रचती है. इन बेहतरीन फिल्मों के साथ मेरी भी कल्पना ने उड़ान भरी तो लगा क्यूं न ये प्लॉट सबके साथ शेयर किए जाएं...


बैंडिट क्वीन

संभावित प्लॉट

फूलन के जीवन का एक नया अध्याय शुरु होता है. इस बार चंबल के बीहड़ नहीं, राजनीति के बीहड़ों से गुजरना था. फूलन 1994 में पैरोल पर छूटती है. खराब स्वास्थ्य और एक के बाद एक खत्म होते साथियों के चलते उसने '83 में आत्मसमर्पण किया था. जेल से छूटने के बाद प्रदेश के तत्कालीन मुखिया ने सरकार की तरफ से उसके खिलाफ चल रहे सारे केस वापस ले लिए.

फूलन एकलव्य सेना का गठन करती है जिसका मकसद था छोटी जाति वालों को साक्षर और आत्मरक्षा के काबिल बनाना था. उमैद सिंह से शादी के बाद फूलन के जीवन एक नई राह पर चल पड़ता है. फूलन का राजनीतिक जीवन शुरु होता है. वह मीरजापुर से 11वीं लोकसभा के लिये चुनी जाती है.

मगर इस नई जिंदगी में सब कुछ नया नहीं है. बीते मौसम की हवाएँ एक बार फिर जिंदगी में आंधी बनकर चल पड़ती हैं. क्षत्रीय स्वाभिमान आंदोलन से जुड़े लोग फूलन के खिलाफ लामबंद होने लगते हैं. फूलन को अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास होता है और वह आलोचनाओं की परवाह किए बगैर उनका इस्तेमाल करने लगती है. 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में कार से निकल रही फूलन को गोलियों से छलनी कर दिया जाता है. यह बेहमई में 22 ठाकुरों को मारे जाने का प्रतिशोध था.

इस तरह एक चक्र पूरा होता है, जातियों को बीच सुलगती रंजिश, वर्चस्व की जंग और राजनीति के अपराधीकरण के बीच से गुजरती फूलन किसी मंजिल तक नहीं पहुंचती मगर उसकी जिजीविषा मौजूदा व्यवस्था पर अनगिनत सवाल छोड़ती चलती है.

क्यूं बने फिल्म?

बैंडिट क्वीन के सिक्वेल में सर्वाधिक संभावनाएं हैं, बीहड़ से निकली एक दलित स्त्री किस तरह से राजनीति में अपनी जगह बनाती है और किस तरह से जाति और वर्चस्व की लड़ाई इस धरातल पर चलती रहती है, यह अपने में एक रोमांचक महागाथा की तरह है और शायद इसे फिल्माया जाना उसके डकैत जीवन को पर्दे पर उतारने से ज्यादा जोखिम भरा है.


परिंदा

संभावित प्लॉट
छोटे भाई करन और नई-नवेली पत्नी की क्रूर हत्या के बाद अन्ना को आग के हवाले करके किशन अपराधों की दुनिया से किनारा कर लेता है. उसके पास अतीत की कड़वी स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचा है. वह मुंबई से दूर गोवा में छोटे से रेस्टोरेंट कारोबारी के रूप में एक गुमनाम सी जिंदगी बसर कर रहा है.

वहां उसकी मुलाकात एक तलाकशुदा महिला अनिता से होती है जो अपने बेटे के साथ अकेली रहती है. किशन को अतीत के अंधेरे से निकालने में उसकी बड़ी भूमिका बनती है. किशन एक नई जिंदगी शुरु करना चाहता है मगर उसका अतीत पीछा नहीं छोड़ता है.

जल्दी ही उसे पता लगता है कि न सिर्फ अन्ना के करीबी बल्कि अन्ना का दुश्मन मूसा के आदमी उसे खत्म करना चाहते हैं. वे उसे खोज निकालते हैं और जिंदगी-मौत की इस नई जद्दोजेहद में किशन का सामना एक भयानक सच्चाई से होता है.

आग में झुलसा अन्ना मरा नहीं जीवित था. वह खुद अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था. उसके साथियों ने पूरे कारोबार पर कब्जा कर लिया था और अब वे अन्ना को मारने के लिए ढूंढ़ रहे हैं. किशन के सामने एक राह निकलती है कोमल, शांत और उम्मीदों से भरे जीवन की और दूसरी एक अंतहीन दौड़ की जहां उसका मुकाबला प्रतिशोध की आग में जलते अन्ना और उसके साथियों से होना है...


क्यूं बने फिल्म?

यह विधु विनोद चोपड़ा का शायद आज भी सबसे बेहतरीन काम है, भारतीय थ्रिलर और अपराध फिल्मों में एक मील का पत्थर. इसमें एक डार्क इंटेंसिटी है. यह कहानी शुरु ही अधर में लटी परिस्थितियों से होती है. याद करें फिल्म में पहली बार माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर कहां मिलते हैं? फिल्म का आरंभ ही एक तनाव भरी परिस्थिति से होता है. यह शैली अपने में कहानी के विस्तार की संभावनाएं समेटे हुए है. परिंदा हमारी दुनिया के समानांतर जैसे एक अलग दुनिया रचती है. उस दुनिया के भीतर जाना, वहां की कहानियों को सुनने का एक अलग ही रोमांच है. 



रोबोट

संभावित प्लॉट
अपने भीतर लगी रेड-चिप के चलते भारी तबाही मचाने के कारण अदालत रोबोट चिट्टी को मानवजाति के लिए खतरा मानती है और उसे डिसएबल करने का आदेश देती है. चिट्टी कई बरसों से एक म्यूजियम का हिस्सा है. वह देखने में भले निष्क्रिय हो, उसका मस्तिष्क सक्रिय है और वह वायरलेस माध्यमों के सहारे से नई टेक्नोलॉजी से खुद को लगातार अपडेट करता रहता है.

एक दिन चिट्टी को एक ऐसी घटना का पता लगता है, जो मानवजाति के लिए एक बड़ा खतरा बनने जा रहा है. दरअसल यह सुदूर अंतरिक्ष से आ रहे एक सिगनल हैं, वैज्ञानिक अभी इस पहेली को सुलझा ही रहे होते हैं कि चिट्टी उन्हें डिकोड कर लेता है.

रोबोट का मानना है कि इन सिगनल्स से ये साफ है कि उनके इरादों में कहीं भी मित्रता का अंश नहीं है, वे पुराने समुद्री डाकुओं की तरह एक के बाद एक उन ग्रहों की खोजते और उन पर फतेह करते आ रहे हैं, जहां जीवन की संभावनाएं हैं. उसकी बात पर कोई यकीन नहीं करता है. चिट्टी के पास एक ही रास्ता है कि वह कानून और अपने रचयिता डा.वशीकरण को दिए वचन को तोड़कर दोबारा सक्रिय हो. वह डा.वशीकरण से बात करता है मगर वे इसके लिए राजी नहीं होते.

एक सुबह धरती का नजारा बदला हुआ दिखता है. तबाही शुरु हो चुकी है. चिट्टी खुद को म्यूजियम से आजाद करता है. शत्रुओं से लड़ने के लिए सबसे पहले उसे खुद को अपग्रेड करना है, वहीं शत्रु उसकी ताकत को भांप चुके और इस तरह एक तेज रफ्तार दौड़ शुरु हो जाती है दुनिया को बचाने की...


क्यूं बने फिल्म?

रोबोट भारत के गिने-चुने साइंस फिक्शंन्स में शायद सबसे बेहतर है. यह फिल्म मनोरंजन के साथ ही एक संवेदनशील मानवीय विषय को भी छूती है. फिल्म में चिट्टी नामक रोबोट बने रजनीकांत के चरित्र में विस्तार की अपार संभावनाएं हैं. उसमें वह गहराई है जो उसे सिक्वेल या सिरीज के लिए उपयुक्त बनाती है. भारत के अन्य सुपर हीरो की तरह वह बनावटी नहीं है. अपने यहां ज्यादातर फिल्मों में सुपरहीरो के मैनेरिज्म, पोशाक या उसके एक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, उसके किरदार पर नहीं. बैटमैन जैसी गहराई ढूंढ़ना तो बहुत दूर की बात है. यह रजनीकांत की खूबी है कि वे इन कमियों से पार पाते हुए खुद को एक दिलचस्प देसी किरदार में ढाल सके हैं.



मनोरमा सिक्स फीट अंडर

संभावित प्लॉट
सत्यवीर सिंह रंधावा (जी हां, यही नाम था इस फिल्म के जूनियर इंजीनियर का जो शौकिया जासूसी नॉवेल भी लिखता था) उसी छोटे शहर की हलचल से रहित दुनिया में मगन है. इस बीच उसकी जिंदगी में थोड़ा बदलाव आया है, घर में एक नन्हीं बच्ची का आगमन हुआ है, और उसकी पत्नी निम्मी पहले के मुकाबले बच्चों में ज्यादा मशगूल है.

सत्यवीर के सामने दूसरी तरह के दबाव हैं. प्रकाशक अब उस पर दबाव डालने लगे हैं. पिछली किताबों की सेल कम हुई है. वहीं कुछ दूसरे लेखकों की खराब किताबें भी काफी बिकी हैं. इसी बीच एक दिन चाय की दुकान पर एक अनजान व्यक्ति बातों-बातों में सत्यवीर को अगले उपन्यास का प्लॉट दे जाता है. सत्यवीर फटाफट उपन्यास लिख देता है. उपन्यास न सिर्फ बिकता है कि बल्कि लंबे समय बात उसके पास पाठकों के पत्र आने शुरु हो जाते हैं.

मामला उस वक्त अचानक एक रहस्यमय करवट लेता है जब उसे यह पता लगता है कि एक हत्या की साजिश को आधार बनाकर उपन्यास में लिखी घटनाएं हू-ब-हू वहां से अस्सी किलोमीटर दूर बसे एक कसबे में हुई घटना से मेल खा रही हैं। सत्यवीर को यह बात पता लगती है तो वह हैरान रह जाता है। राज का पता लगाने के लिए वह उस कसबे जाता है, मगर उसे यह नहीं पता होता है कि ऐसा करके वह अपनी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा खतरा मोल लेने जा रहा है।


क्यूं बने फिल्म?

मनोरमा सिक्स फीट अंडर पश्चिम की नॉयर सिनेमा शैली में एक अद्भुत फिल्म है और कई मायनों में मौलिक भी. इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि इसका परिवेश और नायक का चरित्र चित्रण. इसमें अपार संभावनाएं हैं आगे की कथा बुनने की. यह अपने में शैली या जॅनर की तरह काम कर सकता है. 

पुनश्चयः क्या बोले नवदीप...

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails