February 17, 2012
दादा साहेब फालके से सीखें...
January 21, 2012
सोशल मीडिया पर ‘अनायकों’ की महागाथाएं
हर कोई हैरान था और यह जानना चाहता था कि गोविंद तिवारी आखिर है कौन? शायद उतना ही मामूली इंसान जितना कि लगभग सौ साल पूर्व प्रकाशित उस कहानी का नायक। इलाहाबाद में फाफामऊ का यह लड़का सिर्फ पलक झपकाती तस्वीरों वाले अपने रंगबिरंगे एनीमेशन से भरे ‘सबसे बुरे डिजाइन वाले’ ब्लाग के कारण इंटरनेट पर छा गया और उस पर बने चुटकुले ‘रजनीकांत जोक्स’ को टक्कर देने लगे।
गोविंद तिवारी को मिली यह लोकप्रियता 14 साल की रेबेका ब्लैक की याद दिलाती है, जिसके ‘फ्राइडे’ गीत को यू-ट्यूब पर करीब 20 लाख बार देखा जा चुका है और 50 हजार से ज्यादा लोगों ने उसे नापसंद किया है। लगभग हर किसी ने इस गीत और उसके वीडियो की आलोचना की। उनके गीत को दुनिया का सबसे घटिया गीत बताया गया। यहां तक कि रेबेका को गुमनाम धमकियां भी मिलीं कि अगर उसने अपना वीडियो यू-ट्यूब से नहीं हटाया तो उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा। हालांकि बाद में लेडी गागा जैसी पॉप सिंगर्स ने रेबेका को सराहा और उसकी प्रतिभा को मौलिक बताया। यह कुछ-कुछ एक सामूहिक मज़ाक जैसा लगता है, जैसे शेरिडॅन सिमोव की किताब ‘व्हाट एवरी मैन थिंक अबाउट अपार्ट फ्राम सेक्स’ के साथ हुआ। दो सौ पृष्ठ की इस किताब के भीतरी पृष्ठ बिल्कुल कोरे थे। जाहिर तौर पर यह एक मज़ाक था मगर अमाजोन में इसकी बिक्री का ग्राफ डैन ब्राउन और जेके रोलिंग से भी ऊपर चला गया।
यह तो बात हुई मज़ाक की, लौटते हैं कुछ गंभीर मसलों पर। अभी कुछ ही दिन बीते ‘ब्रोकेन मार्निंग’ नाम से ब्लागिंग करने वाली एक गुमनाम सी दक्षिण भारतीय युवती ने ‘ओपन लेटर टु ए डेल्ही ब्वाय’ नाम की पोस्ट से उत्तर भारतीयों की दिखावे की संस्कृति पर तंज किया तो उसके ब्लाग और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रतिक्रियाओं की भरमार लग गई। वह ट्विटर पर सबसे हॉट ट्रेंड बन गई न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व के ट्विटर ट्रेंड्स में भी उस पर चल रही बहस का असर दिखा। उसकी इस पोस्ट पर ढाई हजार से उपर कमेंट्स देखे जा सकते हैं। हालांकि इस बहस के मिज़ाज का हल्कापन बरकरार रहता है। इंटरनेट पर इन्हीं दिनों एक जोक प्रचलित हुआ, “पहले बम-ब्लास्ट, फिर भूकंप और अब मद्रासन का ब्लाग... दिल्लीवासी आखिर कितने झटके सहेंगें?”
अगर आप गौर करें तो एक बात इन सबमें कॉमन है, ये सारे गुमनाम से चेहरे हैं। ‘अ फेस इन द क्राउड’, मामूली इंसान, भीड़ में कहीं धक्का भी लगे तो आप पलटकर न देखें। दूसरी दिलचस्प बात यह है कि इन्होंने कुछ भी असाधारण नहीं किया। न ही वे ऐसा कुछ करने का दावा करते हैं। गोविंद तिवारी और रेबेका ब्लैक की उकता देने वाली अति-साधारणता ही इंटरनेट पर मज़ाक बनकर छा गई। मगर इसके बाद यह घटना साधारण नहीं रह जाती। एक मद्रासी लड़की अपनी रोजमर्रा के अनुभवों को अपने पर्सनल ब्लाग में लिखती है और वह एक तीखी बहस में बदल जाता है। जो उस वक्त चल रही तमाम राजनीतिक-सामयिक घटनाओं पर भारी पड़ता है। इन परिघटनाओं को हम कैसे समझ सकते हैं? क्या यह सिर्फ किसी का मज़ाक उड़ाने की हमारी आदत का नतीजा भर है, जैसा कि सतही तौर पर देखने में महसूस भी होता है, या बात कहीं आगे जाती है।
आइए सन 2007 में आई फिल्म ‘भेजा फ्राई’ को याद करते हैं। यह मल्टीप्लेक्स की शुरुआती सफल ऑफबीट फिल्मों में भी गिनी जाती है। फिल्म में दर्शक भारत भूषण बने विनय पाठक पर खूब हंसे, मगर उस हंसी के पीछे कहीं-न-कहीं एक बेहद मामूली इंसान की सफलता भी थी। उसकी बेवकूफियां सभ्य समझी जाने वाली सोसाइटी का हास्यास्पद पहलू दिखाती हैं। ‘मैं आज़ाद हूं’ के नायक को रास्ता दिखाने के लिए एक मामूली से इंसान से जबरन महापुरूष में बदलना पड़ता है, मगर ‘पीपली लाइव’ का नायक अंत तक लाचार बना रहता है, वह महान बनाए जाने के प्रति विद्रोह कर देता है और वहां से भाग खड़ा होता है क्योंकि उसकी सहज बुद्धि उसे इसके पीछे चल रही साजिशों के प्रति सचेत करती रहती है। यानी चीजों को देखने की निगाह बदल गई है। एलीट क्लास की निगाह से सोसाइटी को देखने की बजाय आम लोगों की निगाह से देखना।
यह दरअसल एक सामूहिक तोड़फोड़ है। परंपरागत प्रतिमानों को बदलने की एक जिद है। मगर दिलचस्प बात यह है कि इन प्रयासों के कोई मुखिया, अगुआ या नेता नहीं हैं। जैसे बहती हवाओं का कोई स्रोत नहीं होता और वो आंधी बन जाती हैं। यह नया मीडिया है, जो सब कुछ तेजी से बदल रहा है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण शायद आक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट आंदोलन है। विश्व के इतिहास में शायद यह पहला आंदोलन है जिसका कोई नेता नहीं है। इसके पीछे वही आम लोग हैं तो जापान में आई सुनामी के कुछ ही क्षणों बाद सूचना और खबरों का सबसे विश्वसनीय स्रोत बन जाते हैं, ये वही हैं जो मुंबई ब्लास्ट में मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं। धमाकों की अफरा-तफरी के बाद जब वहां का मोबाइल नेटवर्क जाम हो गया तो ट्विटर पर मदद देने के लिए हाथ बढ़े। लोगों ने ठहरने के लिए अपने घर का पता, घर पहुंचाने के लिए अपनी कार और जरूरत पड़ने पर रक्तदान तक का प्रस्ताव दिया। अगर इंटरनेट पर मीडिया एक सामूहिक सामाजिक परिघटना में बदल चुका है तो फिर सौंदर्यशास्त्र से लेकर गुणवत्ता के मानदंड पुराने क्यों रहें?
कारनेल यूनीवर्सिटी ने एक खास प्रोग्राम की मदद से ट्विटर पर अपने नवीनतम शोध में यह साबित कर दिया कि सारी दुनिया में लोगों के मूड और मिजाज का एक खास पैटर्न होता है, जिसे पहचाना जा सकता है। यह लगभग तय है कि धीरे-धीरे सोशल मीडिया ही लोगों की सोच का पैमाना बनता जाएगा। यह किसी भी समाज की एक विराट धक-धक में बदल जाएगा या किसी हद तक बदल चुका है। शायद समाज विज्ञानियों को इसे नए सिरे से समझने की जरूरत पड़ेगी। इस धड़कन ने तमाम रास्ता दिखाने वाले मसीहाओं, इंटैलेक्चुअल समझे जाने वाले दंभी लोगों, गुरूर से भरे लेखकों और कलाकारों को उनकी सीमाओं का अहसास करा दिया है। गोविंद तिवारी और रेबेका ब्लैक खुद सारी जिंदगी अपनी लोकप्रियता की वजह नहीं समझ सकते। वे सिर्फ एक प्रतीक हैं, खास समझे जाने के प्रति विद्रोह का। एक आम आदमी की ताकत का एहसास कराता इसलिए नहीं कि वह खास है, इसलिए कि उसे ‘आम’ ही होना चाहिए।
December 01, 2011
विश्व बाजार में भारतीय मिथक
शुरुआत में यह प्रोजेक्ट वर्जिन ग्रुप के रिचर्ड ब्रान्सन के साथ आरंभ हुआ. मगर कुछ साल के अंतराल पर करार टूट जाने के बाद इस टीम ने लिक्विट कॉमिक्स के नाम से अपने सभी टाइटिल जारी कर दिए. इस सिरीज की खास बात है, जाने-माने फिल्म निर्देशकों को इसकी रचना-प्रक्रिया में शामिल करना- जिनमें गॉय रिची, जॉन वू और शेखर कपूर जैसे नाम शामिल हैं.
इस टीम ने रामायण और महाभारत की कथाओं के आधुनिक संस्करण भी प्रस्तुत किए हैं. यह एक शुरुआत हो सकती है, भारतीय विषयों को अंतर्राष्ट्रीय फलक तक ले जाने की. ठीक उसी तरह जैसे जापान का मंगा एनीमेशन की एक शैली बनकर दुनिया पर छा गया या चीन के मार्शल आर्ट सिनेमा ने दुनिया के बाजार पर कब्जा कर लिया.
यहां प्रस्तुत है- दीपक चोपड़ा की काली पर आधारित कॉमिक्स का डिजिटल संस्करण-
November 22, 2011
हमें ये सीक्वेल चाहिए!
बैंडिट क्वीन
फूलन के जीवन का एक नया अध्याय शुरु होता है. इस बार चंबल के बीहड़ नहीं, राजनीति के बीहड़ों से गुजरना था. फूलन 1994 में पैरोल पर छूटती है. खराब स्वास्थ्य और एक के बाद एक खत्म होते साथियों के चलते उसने '83 में आत्मसमर्पण किया था. जेल से छूटने के बाद प्रदेश के तत्कालीन मुखिया ने सरकार की तरफ से उसके खिलाफ चल रहे सारे केस वापस ले लिए.
फूलन एकलव्य सेना का गठन करती है जिसका मकसद था छोटी जाति वालों को साक्षर और आत्मरक्षा के काबिल बनाना था. उमैद सिंह से शादी के बाद फूलन के जीवन एक नई राह पर चल पड़ता है. फूलन का राजनीतिक जीवन शुरु होता है. वह मीरजापुर से 11वीं लोकसभा के लिये चुनी जाती है.
मगर इस नई जिंदगी में सब कुछ नया नहीं है. बीते मौसम की हवाएँ एक बार फिर जिंदगी में आंधी बनकर चल पड़ती हैं. क्षत्रीय स्वाभिमान आंदोलन से जुड़े लोग फूलन के खिलाफ लामबंद होने लगते हैं. फूलन को अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास होता है और वह आलोचनाओं की परवाह किए बगैर उनका इस्तेमाल करने लगती है. 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में कार से निकल रही फूलन को गोलियों से छलनी कर दिया जाता है. यह बेहमई में 22 ठाकुरों को मारे जाने का प्रतिशोध था.
इस तरह एक चक्र पूरा होता है, जातियों को बीच सुलगती रंजिश, वर्चस्व की जंग और राजनीति के अपराधीकरण के बीच से गुजरती फूलन किसी मंजिल तक नहीं पहुंचती मगर उसकी जिजीविषा मौजूदा व्यवस्था पर अनगिनत सवाल छोड़ती चलती है.
क्यूं बने फिल्म?
बैंडिट क्वीन के सिक्वेल में सर्वाधिक संभावनाएं हैं, बीहड़ से निकली एक दलित स्त्री किस तरह से राजनीति में अपनी जगह बनाती है और किस तरह से जाति और वर्चस्व की लड़ाई इस धरातल पर चलती रहती है, यह अपने में एक रोमांचक महागाथा की तरह है और शायद इसे फिल्माया जाना उसके डकैत जीवन को पर्दे पर उतारने से ज्यादा जोखिम भरा है.
परिंदा
संभावित प्लॉट
छोटे भाई करन और नई-नवेली पत्नी की क्रूर हत्या के बाद अन्ना को आग के हवाले करके किशन अपराधों की दुनिया से किनारा कर लेता है. उसके पास अतीत की कड़वी स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचा है. वह मुंबई से दूर गोवा में छोटे से रेस्टोरेंट कारोबारी के रूप में एक गुमनाम सी जिंदगी बसर कर रहा है.
वहां उसकी मुलाकात एक तलाकशुदा महिला अनिता से होती है जो अपने बेटे के साथ अकेली रहती है. किशन को अतीत के अंधेरे से निकालने में उसकी बड़ी भूमिका बनती है. किशन एक नई जिंदगी शुरु करना चाहता है मगर उसका अतीत पीछा नहीं छोड़ता है.
जल्दी ही उसे पता लगता है कि न सिर्फ अन्ना के करीबी बल्कि अन्ना का दुश्मन मूसा के आदमी उसे खत्म करना चाहते हैं. वे उसे खोज निकालते हैं और जिंदगी-मौत की इस नई जद्दोजेहद में किशन का सामना एक भयानक सच्चाई से होता है.
आग में झुलसा अन्ना मरा नहीं जीवित था. वह खुद अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था. उसके साथियों ने पूरे कारोबार पर कब्जा कर लिया था और अब वे अन्ना को मारने के लिए ढूंढ़ रहे हैं. किशन के सामने एक राह निकलती है कोमल, शांत और उम्मीदों से भरे जीवन की और दूसरी एक अंतहीन दौड़ की जहां उसका मुकाबला प्रतिशोध की आग में जलते अन्ना और उसके साथियों से होना है...
क्यूं बने फिल्म?
रोबोट
संभावित प्लॉट
अपने भीतर लगी रेड-चिप के चलते भारी तबाही मचाने के कारण अदालत रोबोट चिट्टी को मानवजाति के लिए खतरा मानती है और उसे डिसएबल करने का आदेश देती है. चिट्टी कई बरसों से एक म्यूजियम का हिस्सा है. वह देखने में भले निष्क्रिय हो, उसका मस्तिष्क सक्रिय है और वह वायरलेस माध्यमों के सहारे से नई टेक्नोलॉजी से खुद को लगातार अपडेट करता रहता है.
एक दिन चिट्टी को एक ऐसी घटना का पता लगता है, जो मानवजाति के लिए एक बड़ा खतरा बनने जा रहा है. दरअसल यह सुदूर अंतरिक्ष से आ रहे एक सिगनल हैं, वैज्ञानिक अभी इस पहेली को सुलझा ही रहे होते हैं कि चिट्टी उन्हें डिकोड कर लेता है.
रोबोट का मानना है कि इन सिगनल्स से ये साफ है कि उनके इरादों में कहीं भी मित्रता का अंश नहीं है, वे पुराने समुद्री डाकुओं की तरह एक के बाद एक उन ग्रहों की खोजते और उन पर फतेह करते आ रहे हैं, जहां जीवन की संभावनाएं हैं. उसकी बात पर कोई यकीन नहीं करता है. चिट्टी के पास एक ही रास्ता है कि वह कानून और अपने रचयिता डा.वशीकरण को दिए वचन को तोड़कर दोबारा सक्रिय हो. वह डा.वशीकरण से बात करता है मगर वे इसके लिए राजी नहीं होते.
एक सुबह धरती का नजारा बदला हुआ दिखता है. तबाही शुरु हो चुकी है. चिट्टी खुद को म्यूजियम से आजाद करता है. शत्रुओं से लड़ने के लिए सबसे पहले उसे खुद को अपग्रेड करना है, वहीं शत्रु उसकी ताकत को भांप चुके और इस तरह एक तेज रफ्तार दौड़ शुरु हो जाती है दुनिया को बचाने की...
क्यूं बने फिल्म?
मनोरमा सिक्स फीट अंडर
संभावित प्लॉट
सत्यवीर सिंह रंधावा (जी हां, यही नाम था इस फिल्म के जूनियर इंजीनियर का जो शौकिया जासूसी नॉवेल भी लिखता था) उसी छोटे शहर की हलचल से रहित दुनिया में मगन है. इस बीच उसकी जिंदगी में थोड़ा बदलाव आया है, घर में एक नन्हीं बच्ची का आगमन हुआ है, और उसकी पत्नी निम्मी पहले के मुकाबले बच्चों में ज्यादा मशगूल है.
सत्यवीर के सामने दूसरी तरह के दबाव हैं. प्रकाशक अब उस पर दबाव डालने लगे हैं. पिछली किताबों की सेल कम हुई है. वहीं कुछ दूसरे लेखकों की खराब किताबें भी काफी बिकी हैं. इसी बीच एक दिन चाय की दुकान पर एक अनजान व्यक्ति बातों-बातों में सत्यवीर को अगले उपन्यास का प्लॉट दे जाता है. सत्यवीर फटाफट उपन्यास लिख देता है. उपन्यास न सिर्फ बिकता है कि बल्कि लंबे समय बात उसके पास पाठकों के पत्र आने शुरु हो जाते हैं.
मामला उस वक्त अचानक एक रहस्यमय करवट लेता है जब उसे यह पता लगता है कि एक हत्या की साजिश को आधार बनाकर उपन्यास में लिखी घटनाएं हू-ब-हू वहां से अस्सी किलोमीटर दूर बसे एक कसबे में हुई घटना से मेल खा रही हैं। सत्यवीर को यह बात पता लगती है तो वह हैरान रह जाता है। राज का पता लगाने के लिए वह उस कसबे जाता है, मगर उसे यह नहीं पता होता है कि ऐसा करके वह अपनी जिंदगी के लिए सबसे बड़ा खतरा मोल लेने जा रहा है।
क्यूं बने फिल्म?
पुनश्चयः क्या बोले नवदीप...
August 20, 2011
क्या कृष्ण हैं भारतीय नायक?
भारतीय नायक की आर्किटाइपल छवि क्या है? पश्चिम में यह ग्रीक मिथकों और बाइबिल की महागाथा से ओतप्रोत है. वहां मनुष्य और प्राकृतिक शक्तियों के बीच संघर्ष ज्यादा गहरा होकर उभरता है. इसके उलट भारतीय समाज लंबे समय से नायकों की पूजा करता चला आ रहा है. हमारे पौराणिक आख्यानों में नायकों की एक लंबी श्रृंखला है. मगर जो दो अहम नायक भारतीय जीवन में रचे बसे हैं वो हैं राम और कृष्ण. ये दो नाम ही चुनने के पीछे खास वजहें हैं, एक तो अन्य देवी-देवताओं के मुकाबले ये ज्यादा मानवीय हैं, इन्होंने एक आम मनुष्य के अवतार में जन्म से मृत्यु तक का एक पूरा सफर या पौराणिक शब्दावली का सहारा लें तो लीला रची (दिलचस्प है कि यह ‘लीला’ शब्द हमारे नाट्य या सिनेमा के काफी करीब बैठता है); दूसरे इन नायकों का जीवन, घटनाएं और मूल्य हमारे रोजमर्रा के जीवन में जब-तब उदाहरण बनते हैं.
भारतीय सिनेमा का नायक आम तौर पर राम और कृष्ण की छवि को ही खुद में समाहित करता है. राम यानी जिम्मेदार, मूल्यों पर यकीन करने वाला, सभी को साथ लेकर चलने वाला, सहनशील और उदार नायक. कृष्ण यानी पहली सतह पर चंचल, दिलफेंक, चीजों के प्रति अगंभीर रवैये वाला मगर दूसरी सतह पर बेहद शार्प और मौका आने पर चमत्कारिक तरीके से नतीजे देने वाला नायक. भारतीय नायक के ये दोनों चेहरे समानांतर रूप से भारतीय सिनेमा में मौजूद रहे हैं. भारतीय सिनेमा का आरंभ राम की नायकत्व वाली छवि के साथ होता नजर आता है. कृष्ण की चंचल छवि सहनायक के रूप में सामने आती है. धीरे-धीरे इस चंचल, गतिमान, शार्प नायक ने यह साबित कर दिया हमारे इस जटिल समय के नायक की जड़ें कृष्ण में भी खुद को तलाशती हैं.
कृष्ण भारतीय नायक की छवि पर कितना सटीक बैठते हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है सुभाष घई ने अपनी फिल्म हीरो के नायक का नाम ही किशन रखा और बंसी हमेशा उसके हाथों में. कृष्ण के जीवन में भारतीय नायक को गढ़ने वाले तमाम तत्व पर्याप्त रूप से उपस्थित हैं. रोमांस, खिलंदड़ापन, योद्धा और अंततः एक जीवन दर्शन लेकर सामने आने वाला शख्स. यह एक मल्टीडाइमेंशनल पर्सनैलिटी है. यह हर रिश्ते को बड़ी गहराई से उभारता है. मां के रिश्ते में यह यशोदा और देवकी के बीच का कान्फ्लिक्ट लेकर आता है. जिसे बाद में हम मुख्यधारा की कई फिल्मों में देखते हैं. भाई-भाई के तौर पर कृष्ण-बलराम की जोड़ी ने खूब रंग खिलाए हैं. कृष्ण के जीवन में प्रेम और मित्रता के रंग भी काफी गहरे हैं. इसमें बिछोह भी है, शरारत भी है और त्याग भी. राधा और द्रौपदी से उनका मित्रवत संवाद उनके व्यक्तित्व को नया आयाम देता है. सुदामा और कृष्ण का प्रसंग भी दोस्ती के कुछ उदाहरणों में शामिल है. आगे कृष्ण और अर्जुन की दोस्ती अलग तरीके से सामने आती है, वे दोस्त के साथ मार्गदर्शक बनकर भी उभरते हैं.
कई बार कृष्ण ने छल का सहारा तो लिया मगर बड़े हितों को ध्यान में रखते हुए. उन्होंने सिर्फ मूल्यों का अनुसरण करने की बजाय उनका अवमूल्यन करने वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया. उन्होंने लचीला रुख अपनाया और मौके के मुताबिक अपनी रणनीति बदली. भलाई और बुराई के बीच संघर्ष में हमेशा कृष्ण उभरते हैं. याद करें राजीव राय की फिल्म युद्ध में यह पंक्ति तीन बार दोहराई जाती है, वह भी सबसे अहम प्रसंगों में- “डंके की चोट पड़ी है/ सामने मौत खड़ी है/ कृष्ण ने कहा अर्जुन से/ न प्यार जता दुश्मन से/ युद्ध कर”. फिल्मों में कठिन निर्णय के दौर में अक्सर युद्धभूमि पर अर्जुन को उपदेश देते कृष्ण की तस्वीर सामने आती है. कृष्ण दुविधा और आत्मसंघर्ष के क्षणों को भी सामने लाते हैं. मगर यह पश्चिमी मन की दुविधा नहीं है, जो हैमलेट के रूप में सामने आती है, यह दुविधा से उबरकर संघर्ष तक ले जाती है.
तो आपका क्या मानना है, कृष्ण ही हैं हमारे नायक? वैसे कुछ और पौराणिक नायकों का इस दृष्टि से विश्लेषण दिलचस्प रहेगा.
May 02, 2011
9/11 और बॉलीवुड
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| चार अलग-अलग कहानियां, अलग जिंदगी.. एक हादसे की परछाईं उस पर छा जाती है... नसीरुद्दीन शाह की निर्देशित पहली फिल्म इस विषय को छूने वाली उस वक्त की अपने में पहली फिल्म. |
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| अफगानिस्तान पर कई डाक्यूमेंट्रीज बना चुके कबीर खान के निर्देशन में बनी काबुल एक्सप्रेस उस अफगानिस्तान को दिखाती है, जो तालिबान आने के बाद उभरता है... |
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| रेंसिल डि-सिल्वा की इस फिल्म की पृष्ठभूमि भी वही थी, यूएस और ग्लोबल आतंकवाद, नजरिया बस कॉमर्शियल था... |
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| शाहरुख खान की बतौर अभिनेता एक महत्वाकांक्षी फिल्म.. एक ग्लोबल विषय को काफी चतुराई से उठाने की कोशिश की गई थी ग्लोबल ऑइियंस और बाजार का ध्यान रखते हुए. |
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| कबीर खान की एक और बेहतरीन फिल्म थी न्यूयार्क यह न्यूयार्क की एक यूनीवर्सिटी में पढ़ने वाले तीन स्टूडेंट्स की कहानी कहती है... 9/11 के बाद... |
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| शायद सबसे दिलचस्प प्रयोग... यह पॉलिटिकल सटायर था, जिसे लोगों ने खूब सराहा, छोटे बजट के इस स्पूफ का निर्देशन किया था अभिषेक शर्मा ने |
March 31, 2011
ए स्टूपिड कॉमन मैन...

एक नजर इंडिया के आम आदमी की आइकोनिक इमेज वाली पांच फिल्मों पर
आक्रोश (1980)
आम आदमी का गुस्सा एक कभी न खत्म होने वाली चुप्पी बन सकता है. गोविंद निहलानी की पहली फिल्म आक्रोश में ओम पुरी ने इसका एहसास कराया. विजय तेंडुलकर की लेखनी, निहलानी का डायरेक्शन और नसीर, स्मिता और ओम पुरी की शानदार एक्टिंग इसका दर्जा वर्ल्ड की ग्रेट मूवीज तक पहुंचा देती हैं. पूरी फिल्म में उनकी आंखें बोलती रहीं और उनकी खामोशी ने न सिर्फ एडवोकेट भास्कर कुलकर्णी बने नसीरुद्दीन शाह को बल्कि दर्शकों को भी बेचैन कर दिया. एक रेप केस को खोलने की जद्दोजहद में यह फिल्म पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करना शुरु कर देती है. फिल्म रिलीज हुई तो इसने देश भर में एक बहस छेड़ दी.
जाने भी दो यारों (1983)
कई साल पहले आई इस फिल्म का जादू आज भी बरकरार है. नसीरुद्दीन शाह और रवि वासवानी दरअसल फिल्म में उसी तरह से ठगे जाते हैं, जैसे रीयल में लाइफ कॉमन मैन इस पूरे सिस्टम के हाथों छला जाता है. इसके बावजूद उनकी उम्मीद खत्म नहीं होती, हम होंगे कामयाब... गीत गुनगुनाते हुए वे अपनी हार पर भी हंसते हैं. इस फिल्म में जबरदस्त सटायर होने के वावजूद इसके डायरेक्टर कुंदन शाह ने कहीं बिटरनेस नहीं आने दी और फिल्म का मिजाज हल्का-फुल्का रखा. फिल्म की स्क्रिप्ट ये साली जिंदगी के डायरेक्टर सुधीर मिश्र ने लिखी थी, दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में रवि वासवानी के कैरेक्टर का नाम भी सुधीर मिश्र था.
मैं आजाद हूं (1989)
इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से, हारेगा तू हर बाज़ी जब खेलें हम जी-जान से. पूरी फिल्म में कैफी आज़मी का लिखा यही एक गीत बजता रहता है. अभिताभ को छोड़कर इस फिल्म में अधिकतर एक्टर थिएटर या नॉन कॉमर्शियल सिनेमा से थे. चाहे रघुवीर यादव हों या मनोहर सिंह या रामगोपाल बजाज. हॉलीवुड की फिल्म मीट जॉन डो से इंस्पायर्ड इस फिल्म में आम आदमी मीडिया छल में फंसकर सुसाइड करने पर मजबूर कर दिया जाता है. मगर उसकी इच्छाशक्ति मौत के बाद तमाम लोगों की आवाज बन जाती है. टीनू आनंद ने अपने फिल्म कॅरियर में एक बिल्कुल अलग फिल्म बनाई.
ए वेडनेसडे (2008)

मैं वो हूं जो आज बस और ट्रेन में चढ़ने से डरता है, मैं वो हूं जो काम पर जाता है तो उसकी बीवी को लगता है वह ज़ंग पर जा रहा है. मैं वो हूं जो कभी बरसात में फंसता है कभी ब्लास्ट में. झगड़ा किसी का भी हो, बेवजह मरता मैं ही हूं. भीड़ तो देखी होगी आपने? भीड़ में से कोई भी शक्ल ले लीजिए, वह मैं हूं. ए स्टूपिड! ए स्टूपिड कॉमन मैन... यह नसीरुद्दीन शाह का आखिरी लंबा डायलाग था और शायद आज के दौर में आम आदमी की सबसे बेहतरीन परिभाषा. डायरेक्टर नीरज पांडेय की पहली फिल्म जबरदस्त हिट हुई और लोगों के दिल को भी छुआ.
पीपली लाइव (2010)
नत्था अवश्य मरेगा... टीवी चैनल पर लोग जोर-शोर से कहते हैं. मगर नत्था मरना नहीं चाहता. उसे समझ में नहीं आता कि उसे चारो तरफ कौन सा मीडिया और पॉलीटिक्स का ड्रामा चल रहा है. पीपली लाइव की पॉपुलैरिटी के पीछे शायद यही वजह थी. फिल्म बताती है कि आम आदमी के बहाने सभी अपना हित साधना चाहते हैं. फिल्म की डायरेक्टर अनुष्का रिज़वी ने रीयल लाइफ का टच देकर एक ड्रामा क्रिएट किया और अद्भुत फिल्म बनाई. फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही सिंबालिक है, जब मीडिया में छाया नत्था देखते-देखते महानगर की गुमनाम भीड़ का हिस्सा बन जाता है.
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और अंत में
बातें करने को इतना तरस गया था कि सोचा थोड़ी सी पीकर अपने आप से कुछ कहूंगा....
ज़िंदगी भी इक नशा है दोस्त... जब चढ़ता है तो पूछो मत क्या आलम होता है... लेकिन जब उतरता है...
फिल्म गाइड (1965) में राजू (देव आनंद)















